सुगंध दशमी पर महिलाओं ने रखा व्रत
शीतलनाथ भगवान की पूजा कर अर्पित की धूप

जसवंतनगर,इटावा। दशलक्षण महापर्व के तहत सोमवार को नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर और लुधपुरा जैन मंदिर में सुगंध दशमी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होकर धर्मलाभ लिया। महिलाओं ने व्रत-उपवास रखकर विशेष पूजा-अर्चना की।
कार्यक्रम का शुभारंभ जिनेंद्र भगवान के अभिषेक और शांतिधारा से हुआ। मंदिर में चल रहे दशलक्षण विधान में सोमवार को सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य राजकमल चिराग जैन परिवार को मिला। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन कर भगवान से सुख-शांति और आत्मकल्याण की कामना की।
इस अवसर पर मुनि श्री 108 भाव सागर जी महाराज ने उत्तम संयम धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि पंच इंद्रियों को वश में करना ही उत्तम संयम है। केवल बाहरी इंद्रियों पर नियंत्रण पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन को वश में करना भी जरूरी है। मन पर नियंत्रण होने पर ही व्यक्ति वास्तविक अर्थों में संयम और अनुशासन को जीवन में धारण कर सकता है।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म में ब्रह्मचर्य व्रत का विशेष महत्व है। इंद्रियों और मन को नियंत्रित कर संयमित जीवन जीने वाला व्यक्ति आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है। संयम केवल इंद्रियों को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, दया और अहिंसा का भाव रखना भी इसका स्वरूप है। पानी को छानकर पीने जैसी छोटी-छोटी सावधानियों से भी सूक्ष्म जीवों की हिंसा से बचने का प्रयास किया जाता है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से धर्म को केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रखने और सम्यक भाव व जागरूकता के साथ जीवन में उतारने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इंद्रियों, मन, वाणी और व्यवहार पर नियंत्रण रखते हुए धर्म के सिद्धांतों का पालन करने से ही उत्तम संयम धर्म सार्थक होता है।
दोपहर में सुगंध दशमी के अवसर पर शीतलनाथ भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने हवन कुंड में धूप अर्पित कर आठों कर्मों के नाश और मोक्ष पद की प्राप्ति की कामना की। धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान मंदिर परिसर भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के मंगल प्रवचन का श्रवण कर धर्मलाभ लिया।



