पढ़ने आया था, लाश बनकर लौटा; देहरादून में एमबीए छात्र एंजेल चकमा के साथ जो हुआ, उसे सुन रूह कांप जाएगी

देवभूमि उत्तराखंड में एमबीए स्टूडेंट एंजेल चकमा की हत्या की खबर से समूचा देश स्तब्ध है। नस्लीय हमले में उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। हमले में एंजेल का भाई गंभीर रूप से घायल है। सभ्य समाज में नफरती एवं नस्लीय सोच की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। बेहतर करियर की उम्मीद के साथ एंजेल ने त्रिपुरा से देहरादून आकर एमबीए की पढ़ाई शुरू की थी।
माता-पिता को लाडले बेटे से ढेरों उम्मीदें रही होंगी, मगर नियति को शायद कुछ और मंजूर था। एंजेल चकमा पर चाइनीज होने की तोहमत लगाकर जिस बेदर्दी से चाकू मारकर मौत के घाट उतार दिया गया, वह वाकई बेचैन करता है। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति कभी ऐसी नहीं रही। हम सकल विश्व को एक परिवार की भांति मानने की भावना मन में रखते हैं। एंजेल के साथ जो कुछ हुआ, वह कतई नहीं होना चाहिए था। उसके पिता बीएसएफ में तैनात हैं, जो दिन-रात देश की रक्षा के लिए समर्पित हैं।
मैं भारतीय हूं, फिर भी हमलावरों ने बख्शा
जानलेवा हमले के दौरान एंजेल चकमा को यह कहना पड़ा कि मैं भारतीय हूं, इसके बावजूद हमलावरों का दिल नहीं पसीजा। कुछ देशों में अक्सर भारतीय नागरिकों को नस्लीय टिप्पणी तथा हमलों का शिकार होना पड़ता है। इस प्रकार की कोई घटना सामने आने पर पूरे देश में एकाएक उबाल देखने को मिलता है। यह बेहद शर्मनाक है कि देश के भीतर देश के कुछ हिस्सों के नागरिकों की भारतीयता पर बार-बार सवाल उठाए जाते हैं। एंजेल चकमा की मौत के बाद से त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में काफी आक्रोश है और ये जायज भी है।
अमेरिका, यूरोप या ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के विरुद्ध नस्लभेदी अपराध होने पर जो देश विरोध जताता है, उसके भीतर ही कुछ तबकों में इतनी गहरी और खतरनाक नस्लीय सोच मौजूद है। इनके निशाने पर बार-बार पूर्वोत्तर के नागरिक आते रहते हैं। पूर्वोत्तर के अधिकांश नागरिकों का मानना रहा है कि उन्हें उनके चेहरे-मोहरे के कारण निशाना बनाया जाता है। यह बताता है कि नागरिकों में अपने ही देश के विषय में कितनी कम जागरूकता है। इसके अलावा पूर्वोत्तर के नागरिकों को देश के विभिन्न हिस्सों में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसी प्रत्येक घटना के बाद प्रभावी कार्रवाई की बात की जाती है, मगर सवाल है कि क्या उनसे कोई सबक लिया जा रहा?
देश की राजधानी में ग्यारह साल पहले अरुणाचल के छात्र की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। एंजेल चकमा की हत्या के बाद देश में नस्लवाद विरोधी कानून की मांग तेजी से उठी है। यह मांग उचित भी है। चूंकि नस्लवाद देश की एकता एवं अखंडता के लिए खतरनाक है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जब भी भारत के किसी शहर में किसी एंजेल के साथ भेदभाव किया जाता है, तो उससे एक बड़े वर्ग की भावनाओं को चोट पहुंचती है।
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अब ऐसा कानून चाहिए जो इन मामलों में आरोपियों के प्रति सख्ती और पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता दिखाए। एंजेल हत्याकांड के बाद नागरिकों के निशाने पर आई उत्तराखंड सरकार ने आरोपियों के विरुद्ध सख्त रुख अपनाया है। छह में से पांच आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। मुख्य आरोपी फरार है। वह मूल रूप से नेपाल का रहने वाला बताया जाता है। फरार आरोपी भी छात्र है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि भविष्य में फिर कोई एंजेल बेमौत न मारा जा सके।



