2011 में 0 से 2021 में 77 तक, जानें क्या BJP बंगाल में ममता का किला ढहा पाएगी

West Bengal Politics 2026: देश में ‘चार्जशीट’ तैयार करने की जिम्मेदारी विभिन्न जांच एजेंसियों पर है। ये एजेंसियां केंद्र एवं राज्य सरकारों के अधीन कार्यरत हैं। इनमें सिविल पुलिस, स्पेशल टास्क फोर्स (एटीएस), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) आदि संस्थाएं प्रमुख हैं। अपराध की प्रवृत्ति के आधार पर चार्जशीट मतलब आरोप पत्र तैयार कर संबंधित न्यायालय के समक्ष पेश किया जाता है। इसके आधार पर कोर्ट द्वारा अपराधियों के लिए सजा का निर्धारण होता है। इसके इतर आजकल ‘राजनीतिक चार्जशीट’ भी चर्चाओं में है।
बंगाल में नया एक्सपेरिमेंट देखने को मिला
राजनीतिक दल एक-दूसरे के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर जनता के बीच पहुंच रहे हैं। यह नया एवं अनूठा प्रयोग पश्चिम बंगाल में देखने को मिला है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच जुबानी जंग चरम पर पहुंच रही है। टीएमसी और भाजपा ‘चार्जशीट-चार्जशीट’ खेल रहे हैं।
पहले भाजपा ने चार्जशीट तैयार कर टीएमसी को घेरने का प्रयास किया। बदले में टीएमसी ने भी इसी अंदाज में पलटवार कर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया है। भाजपा की चार्जशीट में घुसपैठ, भ्रष्टाचार, कट मनी सिस्टम, कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, युवाओं का पलायन, उद्योग और निवेश की खराब स्थिति, किसान, ग्रामीण संकट, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, लोकतंत्र और संस्थाओं पर हमले जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया गया है।
जबकि टीएमसी की चार्जशीट में देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों, भाजपा शासित राज्यों में बढ़ते अपराध इत्यादि बिंदुओं का उल्लेख किया गया है। टीएमसी ने गृह मंत्री पर तंज कसकर ‘मोटा भाई, जवाब चाई (बड़े भाई, जवाब चाहिए) के नारे के साथ केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों की विफलताओं को राष्ट्रीय पटल पर उजागर किया है।
बीजेपी को क्यों चाहिए WB की सत्ता
जैसे-जैसे चुनाव निकट आ रहे हैं, वैसे-वैसे बंगाल की सियासत गरमा रही है। देश के चार राज्यों के अलावा एक केंद्र शासित राज्य में विधानसभा चुनाव कराए जाने हैं, मगर सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल की हो रही है। इस राज्य में पिछले पंद्रह साल से टीएमसी का एकछत्र राज चल रहा है। बंगाल की सत्ता पर बैठने को भाजपा काफी उतावली नजर आ रही है।
पिछले तीन चुनाव की बात करें तो टीएमसी और भाजपा ने निरंतर अपनी स्थिति को सुधारा है। 2011 में टीएमसी 184 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी। उस समय भाजपा का खाता तक नहीं खुल पाया था। इसके बाद 2016 के चुनाव में टीएमसी ने सर्वाधिक 211 और भाजपा ने महज 6 सीटें हासिल की थीं। 2021 चुनाव में टीएमसी की जीत का आंकड़ा 211 से बढ़कर 2015 पर पहुंच गया था, मगर इस चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीतकर टीएमसी सहित अन्य दलों को चौंका दिया था।
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पिछले तीन चुनाव के यह आंकड़े बताते हैं कि टीएमसी को सत्ता से उखाड़ फेंकने की भाजपा की रणनीति सफल नहीं हो पाई। मौजूदा चुनाव में दोनों दल एक बार फिर आमने-सामने हैं। चुनाव में भाजपा ने महिला सुरक्षा, टीएमसी की गुंडागर्दी के अलावा ममता बनर्जी सरकार में भ्रष्टाचार के साथ बांग्लादेश की घुसपैठ को मुद्दा बनाया है। टीएमसी ने बंगाली अस्मिता कार्ड खेलकर बंगाल की उपेक्षा के आरोप मढ़े हैं।
टीएमसी का आरोप है कि केंद्र ने राज्य के साथ भेदभाव किया। पार्टी इसके अलावा एसआईआर के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठा रही है। पश्चिम बंगाल में भाजपा क्या करिश्मा करेगी, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल सत्ता पक्ष की बेचैनी जरूर बढ़ी हुई है।



