मनमोहन को हटाना भूल थी, देश के बड़े वकील को अब हो रहा पछतावा

हाल के दिनों में जब देश पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुण्यतिथि मना रहा है, तो एक अहम मुद्दा फिर से सामने आया है। यह मुद्दा उस आंदोलन से जुड़ा है, जो यूपीए सरकार के विरुद्ध खड़ा हुआ था, खासकर सीएजी रिपोर्ट को लेकर। उस समय देश में एक व्यापक आंदोलन चल रहा था, जिसका नेतृत्व अन्ना हजारे ने किया था। यह आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था और इसने न केवल युवाओं को बल्कि बुजुर्गों, महिलाओं और पुरुषों को भी सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया था। आंदोलन के दौरान अन्ना हजारे के साथ कई प्रमुख नेता जैसे अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव मंच पर थे।
अन्ना हजारे आंदोलन: भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष और उसके परिणाम
आंदोलन ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध इतनी गर्मी पैदा की कि उसे जन आंदोलन का रूप दिया गया। आरोप लगे कि कांग्रेस की सरकार में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है और इसे हटाए बिना देश का विकास संभव नहीं है। अरविंद केजरीवाल ने इस आंदोलन को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में बदल लिया और दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए। इस दौरान उनके साथी नेताओं ने भी कांग्रेस और भ्रष्टाचार पर लगातार हमले किए और जनता को भरोसा दिलाया कि वे ही देश की सूरत बदल सकते हैं।
मगर समय बीतने के साथ इस आंदोलन में विभाजन हुआ। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि केजरीवाल पार्टी बनाने के लिए खुद को एकाधिकारवादी बना रहे थे, जबकि दूसरी तरफ उन्होंने खुद एक राजनीतिक पार्टी स्थापित की और सत्ता में आ गए। इसके बाद वे उन ही नेताओं से हाथ मिलाने लगे, जिन्हें पहले भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत आलोचना की थी। ये स्थिति लोगों के लिए चौंकाने वाली थी, क्योंकि यही नेता कभी सत्ता को उखाड़ फेंकने की बात कर रहे थे।
प्रशांत भूषण जो इस आंदोलन के शुरुआती समर्थक थे, अब इस स्थिति को लेकर पछताए हुए हैं। उन्होंने हाल ही में अपने बयान में कहा कि उन्हें अफसोस है कि उन्होंने उस आंदोलन का हिस्सा बनकर मनमोहन सिंह को बदनाम किया।
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भूषण ने स्वीकार किया कि उनका और उनके परिवार का योगदान उस आंदोलन में था मगर आज वह यह महसूस कर रहे हैं कि वह एक “फरेब” का हिस्सा बने थे। उनका कहना है कि यह आंदोलन नहीं था बल्कि एक साजिश थी, जिससे केवल सत्ता परिवर्तन हुआ मगर उस परिवर्तन के बाद जो हालात बने, वह किसी से छिपे नहीं हैं।
हमने एक ईमानदार पीएम को बदनाम किया
मनमोहन सिंह की ईमानदारी की अब अधिक पहचान हो रही है। जब उस समय के विरोधियों से पूछा गया कि क्या किसी मंत्री या उनके सहयोगी के विरुद्ध कोई मामला दर्ज हुआ, तो जवाब था कि नहीं। आज के दौर में अगर कोई ऐसा आंदोलन करने की कोशिश करता है, तो उसका हश्र क्या होगा, यह सब जानते हैं। इसके बावजूद उस समय के नेता जो उग्र थे, अब अपने किए गए फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं और माफी मांग रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल, जो कभी कांग्रेस के विरुद्ध थे, अब उसी कांग्रेस से सीट शेयरिंग की बात करते हैं। प्रशांत भूषण ने भी खुलकर माना कि उनका आंदोलन एक गलत दिशा में था। वह अब यह मानते हैं कि मनमोहन सिंह का शासन सचमुच ईमानदार था और जो आरोप उन पर लगाए गए थे, वह बेबुनियाद थे।



