अमेरिका का दबाव, रूस से दूरी, वेनेजुएला से तेल; जानें क्या भारत ने सही फैसला लिया

Oil trade news: तेल का खेल बड़ा निराला है। इसके चक्कर में दुनिया भर में घमासान चल रहा है। अमेरिका ने रूस से तेल की खरीदारी करने पर भारत पर मनमाना टैरिफ थोप दिया। अमेरिका, रूस, सऊदी अरब और ईरान जैसे देश तेल के दम पर अपनी जेब खूब गर्म करते रहे हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढ़ने के बावजूद तेल की डिमांड में कमी नहीं आई है। पेट्रोल-डीजल की जरूरत प्रत्येक देश को है।

सस्ते दामों पर कच्चा तेल खरीदने के लिए लॉबिंग चलती रही है। अमेरिका के दबाव में आकर भारत को रूस के साथ तेल की आपूर्ति कम करनी पड़ी है। तेल आपूर्तिकर्ता देशों की सूची में वेनेजुएला भी शामिल है। वेनेजुएला वही देश है, जहां के राष्ट्रपति को कुछ दिन पहले अमेरिका ने ताकत के दम पर अगवा कर बंधक बना लिया था।

वेनेजुएला के प्रेसिडेंट फिलहाल अमेरिकी कैद में हैं। इस बीच भारत और वेनेजुएला के मध्य कूटनीति ने एकाएक रफ्तार पकड़ी है। पीएम मोदी और वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज के बीच टेलीफोन वार्ता ने वैश्विक ऊर्जा राजनीति में जबरदस्त हलचल उत्पन्न कर दी है। दोनों नेताओं के बीच इस वार्ता का सीधा संबंध तेल से होना बताया जाता है। वेनेजुएला दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडारण वाला देश है। दशकों तक कठोर सरकारी नियंत्रण के बाद अब कानूनों में व्यापक सुधार किए गए हैं।

भारत ने उठाया अवसर का लाभ

खोज, उत्पादन, वितरण और विपणन में निजी भागीदारी को अनुमति दी गई है। कर और रॉयल्टी घटाई गई हैं, बड़े प्रोजेक्ट के लिए शुल्क और कम किए जा सकते हैं और विवादों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता खोला गया है। इस प्रकार यह बदलाव कर पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज के दौर की राष्ट्रीयकरण नीति को पलट दिया गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने अवसर का लाभ उठाकर सस्ता रूसी तेल बड़ी मात्रा में खरीदा। इससे देश की ऊर्जा जरूरतें भी पूरी हुईं और कीमतों पर भी नियंत्रण रहा, मगर अब हालात बदल रहे हैं।

अमेरिका का दबाव बढ़ा है, व्यापार शुल्क भारी हो गए हैं। प्रतिबंधों के कारण आपूर्ति व्यवस्था जटिल हो गई है। नतीजन भारत अब तेल आयात के नए विकल्प खोज रहा है। आयात के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर में रूस से तेल खरीद दो साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। इसके अलावा ओपेक देशों से आने वाले तेल की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। कई भारतीय रिफाइनरी ने रूसी कच्चे तेल से दूरी बना ली है और आपूर्ति स्रोत बदलने आरंभ कर दिए हैं। वैसे मोदी और रोड्रिगेज की वार्ता सिर्फ एक शिष्टाचार नहीं, बल्कि सामरिक संकेत है।

अमेरिका पर विश्वास मतलब पांव पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर, वजह जानें

भारत साफ तौर पर संदेश दे रहा है कि वह किसी एक स्रोत या किसी एक धड़े के साथ नहीं रहेगा। ऊर्जा सुरक्षा भारत की आर्थिक संप्रभुता की रीढ़ है और इस रीढ़ को मजबूत करने के लिए बहुध्रुवीय नीति अनिवार्य है। वेनेजुएला के दरवाजे खुलना भारत के लिए अवसर की तरह है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार तक पहुंच सस्ती और स्थिर आपूर्ति का रास्ता खोल सकती है।

हालांकि भारत को अमेरिकी शर्तों, भुगतान नियमों और भू-राजनीति की रस्साकशी में संतुलन भी साधना होगा। सामरिक रूप से यह कदम रूस पर निर्भरता घटाकर भारत की सौदेबाजी की ताकत को और बढ़ाता है। यदि भारत वेनेजुएला से तेल खरीद फिर शुरू करता है तो अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव कम होने की उम्मीद है।

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