क्या अब मुस्लिम वोट बैंक को खो रही है कांग्रेस, जीता जागता उदाहरण बने शकील अहमद

कांग्रेस और राहुल गांधी क्या मुस्लिमों से निरंतर दूरी बना रहे हैं? क्या कांग्रेस अल्पसंख्यकों को सिर्फ वोट बैंक समझती है? क्या जमीनी स्तर पर उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है? कांग्रेस के पूर्व नेता शकील अहमद द्वारा गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद बिहार से नई दिल्ली तक सियासी हलचल बढ़ गई है। शकील अहमद ने जहां कांग्रेस हाईकमान से अपनी जान को खतरा बताया है, वहीं भाजपा ने राहुल गांधी को तानाशाह करार दे दिया है।
शकील ने बढ़ा दी कांग्रेस की मुश्किलें
पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे हैं। पार्टी में रहकर उन्होंने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया था। हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कर दिया था। शकील के नए आरोपों ने कांग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है। यह सवाल एक बार फिर चर्चाओं में है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में मुस्लिमों का भविष्य आज कितना सुरक्षित है?
वैसे समय के साथ विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव ने मुस्लिमों को कांग्रेस से दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। शकील अहमद ने ऐसे समय में कांग्रेस को कटघरे में खड़ा किया है, जब असम, केरल, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में मुस्लिम वोट बैंक का काफी प्रभाव है। पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद काफी पहले कांग्रेस से नाता तोड़ चुके हैं। वह समय-समय पर कांग्रेस की गलत नीतियों पर खुलकर बोलते रहे हैं। गुलाब नबी के बाद शकील अहमद जैसे दिग्गज नेता की बगावत कांग्रेस के लिए कतई अच्छे संकेत नहीं माने जा रहे हैं।
बहुत खराब दौर से गुजर रही है पार्टी
पिछले ग्यारह साल से यह पार्टी बेहद खराब दौर से गुजर रही है। सोनिया गांधी ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। प्रियंका गांधी सिर्फ चुनावी मौसम में सक्रिय दिखाई पड़ती हैं। पार्टी को मजबूत बनाने की राहुल गांधी की रणनीति अब तक नाकाम रही है। कांग्रेस बनाम शकील अहमद की यह लड़ाई दिलचस्प हो रही है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने शकील को सड़ा आलू करार दे डाला है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि सड़ा आलू ढेरे से बाहर हो जाता है, उसका कोई महत्व नहीं रहता।
एक समय था जब मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस का सबसे मजबूत आधार माना जाता था। यूपीए सरकार के दौरान सच्चर कमेटी की सिफारिश से लेकर विभिन्न योजनाएं इसी वर्ग को ध्यान में रखकर लाई गईं। तब कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगता था, मगर वक्त के साथ मुस्लिम वोटर भी राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग हो गए हैं। उन्होंने विजयी विकल्पों को चुनना शुरू कर दिया है। इसमें कहीं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), कहीं राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कहीं एआईएमआईएम और यूपी में सपा को कांग्रेस का विकल्प बनाया।
नतीजा यह निकला कि कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक धीरे-धीरे खिसकता चला गया। कांग्रेस में अब भी मौजूद मुस्लिम नेता जैसे तारिक अनवर और राशिद अल्वी भी शकील अहमद के सुर में सुर मिलाते दिख रहे हैं।
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कई मुस्लिम नेता खुद को टिकट बांटने, संगठन और प्रचार से दूर महसूस कर रहे हैं। यहां तक आरोप हैं कि राहुल गांधी अल्पसंख्यक नेताओं के साथ सार्वजनिक मंचों पर तस्वीरें खिंचवाने तक से बचते हैं। भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति की सफलता को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने रणनीति के तहत राहुल गांधी का व्यक्तित्व बदलने की कोशिश भी की थी, मगर इसमें वह सफल नहीं हो सकी। हिंदू वोट बैंक को लुभाने में राहुल गांधी असफल रहे हैं।



