दिव्यांग शिक्षार्थियों को केवल सहानुभूति की नहीं, मौके और उपयुक्त संसाधनों की आवश्यकता होती है- अनुभवी सिंह

मानवाधिकार दिवस पर समावेशी शिक्षा : दिव्यांग शिक्षार्थियों के अधिकार और शिक्षक की भूमिका” विषयक संगोष्ठी

सुलतानपुर। राणा प्रताप पी.जी. कॉलेज के बी.एड. विभाग द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर “समावेशी शिक्षा : दिव्यांग शिक्षार्थियों के अधिकार और शिक्षक की भूमिका” विषय पर एक सारगर्भित एवं जागरूकता-परक संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ. भारती सिंह ने की।

उन्होंने कहा कि समावेशी शिक्षा मानवाधिकारों की सच्ची अभिव्यक्ति है। हर बच्चे के भीतर सीखने की क्षमता होती है, बस शिक्षक को उसे पहचानने और अवसर देने की आवश्यकता होती है। असिस्टेंट प्रोफेसर शांतिलता कुमारी ने अपने उद्बोधन में कहा कि दिव्यांगता किसी विद्यार्थी की सीखने की क्षमता को कम नहीं करती; बाधा केवल समाज की सोच और शिक्षण वातावरण में होती है।

शिक्षक यदि सहयोगी दृष्टिकोण अपनाएँ, तो कक्षा हर बच्चे के लिए सहज बन सकती है। डॉ. संतोष अंश ने कहा कि समावेशी शिक्षा से ही हम ऐसा समाज बना सकते हैं जहाँ किसी भी बच्चे को उसकी कमी के आधार पर अलग-थलग न किया जाए। शिक्षक ही वह सेतु हैं जो दिव्यांग विद्यार्थियों को मुख्यधारा से जोड़ते हैं। समावेशी शिक्षा केवल कक्षा का विषय नहीं, बल्कि मानवता का दायित्व है । दिव्यांग शिक्षार्थियों की राष्ट्र उन्नयन में महती भूमिका है, उसे समावेशी शिक्षा का अधिकार सुलभ कराना शिक्षक और का दायित्व है। उसके अनुकूल विद्यालय का वातावरण होना चाहिये।

भारत के उत्कृष्ट भविष्य का निर्माण हम कक्षा में कर सकते है। डॉ. सीमा सिंह ने कहा कि विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए बहु-संवेदी शिक्षण अत्यधिक प्रभावी होता है। शिक्षकों को लचीली पद्धतियों को अपनाना चाहिए ताकि हर विद्यार्थी समान रूप से सीख सके।

बी.एड. द्वितीय वर्ष की आर्चिता सिंह ने कहा कि समावेशी शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हर बच्चे को सम्मान और सुरक्षा का वातावरण मिले। एक सच्चा शिक्षक वही है जो विद्यार्थी की कमजोरी नहीं, उसकी क्षमता को पहचानता है। अनुभवी सिंह ने कहा कि दिव्यांग शिक्षार्थियों को केवल सहानुभूति की नहीं, अवसर और उपयुक्त संसाधनों की आवश्यकता होती है। विद्यालयों में रैम्प, ब्रेल पुस्तकों, श्रवण-सहायक उपकरणों जैसी सुविधाएँ अनिवार्य होनी चाहिए।

हिमांशु सिंह ने कहा कि समावेशी शिक्षा भविष्य का मॉडल है। इससे दिव्यांग विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अन्य बच्चों की तरह अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। बी एड़ प्रथम वर्ष के अभिषेक कुमार ने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग को सशक्त बनाए।

शिक्षक का संवेदनशील होना बहुत जरूरी

दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षक का संवेदनशील होना सबसे बड़ी आवश्यकता है। आभा शुक्ला ने कहा कि विद्यालयों को ऐसा शिक्षण वातावरण देना होगा जहाँ हर बच्चा सुरक्षित और स्वीकार किया हुआ महसूस करे। खुशी सिंह ने कहा कि दिव्यांग बच्चों को स्वयं को साबित करने का मौका तभी मिलता है जब शिक्षक उनके अंदर छिपी क्षमता को पहचानकर उचित मार्गदर्शन देते हैं।श्रद्धा यादव ने कहा कि समावेशी शिक्षा विविधता को स्वीकार करने की कला है। शिक्षक यदि छात्रों में समानता और सहयोग की भावना विकसित करें तो कक्षा अपने आप समावेशी बन जाती है।

श्वेता मौर्या ने कहा कि मानवाधिकार दिवस की भावना तभी साकार होगी जब किसी भी दिव्यांग विद्यार्थी को शिक्षा से वंचित न होने दिया जाए।शिखा मौर्या ने कहा कि हम विद्यार्थियों को भी यह जिम्मेदारी समझनी चाहिए कि कक्षा में किसी भी दिव्यांग साथी के साथ भेदभाव न करें, बल्कि उसे सहयोग और सम्मान दें। संगोष्ठी का सफल संचालन बी.एड. द्वितीय वर्ष की छात्रा अनुभवी सिंह ने किया।

अंत में विभागाध्यक्ष डॉ. भारती सिंह ने सभी वक्ताओं, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।संगोष्ठी में बी.एड. प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी उत्साहपूर्वक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य समावेशी शिक्षा, मानवाधिकारों और दिव्यांग विद्यार्थियों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा देना रहा।

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