साहित्य का मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र को सही दिशा देकर मानवता का कल्याण करना है- प्रो निशा सिंह

राणा प्रताप पीजी कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में ‘साहित्य और युवा : बदलते मूल्य एवं विचार’ विषय पर कक्षा सेमिनार का आयोजन

सुलतानपुर। राणा प्रताप पीजी कॉलेज, सुलतानपुर के अंग्रेजी विभाग में ‘साहित्य और युवा : बदलते मूल्य एवं विचार’ विषय पर कक्षा सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में महाविद्यालय की उपप्राचार्य एवं अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. निशा सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य समाज में परीक्षित होता है और समाज की वास्तविक परिस्थितियों, विचारों तथा मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है। साहित्य युवाओं को दिशा दिखाने के साथ उनके विचारों को परिष्कृत करता है तथा जीवन की चुनौतियों से जूझने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि तनाव मुक्ति, वैचारिक परिपक्वता और मानवीय संवेदनाओं के विकास का सशक्त साधन है।

प्रो. निशा सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया और आधुनिकता के नाम पर युवाओं के समक्ष अनेक ऐसी प्रवृत्तियां प्रस्तुत की जा रही हैं, जो उनके मानसिक तनाव को बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों को भी प्रभावित कर रही हैं। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कभी-कभी असम्मानजनक भाषा और नकारात्मक विचारों को प्रोत्साहित किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह विचार करना आवश्यक है कि युवा पीढ़ी में इस प्रकार की प्रवृत्तियां क्यों विकसित हो रही हैं। हमारा साहित्य हमें ऐसा आचरण नहीं सिखाता। वेद, पुराण, रामचरितमानस तथा भारतीय प्राचीन साहित्य में सदैव मर्यादा, सदाचार, करुणा, सम्मान और लोककल्याण का संदेश दिया गया है।

उन्होंने कहा कि आधुनिकता का अर्थ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विमुख होना नहीं, बल्कि परंपरा के श्रेष्ठ मूल्यों को आत्मसात करते हुए विवेकपूर्ण ढंग से आगे बढ़ना है। आज युवाओं को ऐसे साहित्य की आवश्यकता है, जो उन्हें जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करे और राष्ट्र एवं समाज के प्रति उनके दायित्वों का बोध कराए। भारतीय साहित्य के साथ-साथ विश्व साहित्य के महान साहित्यकारों ने भी सदैव मानवता, नैतिकता और सामाजिक चेतना को अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। शेक्सपियर, जॉन मिल्टन और पी.बी. शेली जैसे साहित्यकारों की रचनाएं आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं। साहित्य का मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र को सही दिशा देकर मानवता का कल्याण करना है।

कार्यक्रम में अंग्रेजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनादि मिश्रा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है। साहित्य के अध्ययन से विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, संवेदनशीलता, तार्किक क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास होता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे साहित्य को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन और व्यवहार का हिस्सा बनाएं।

सेमिनार में विद्यार्थियों ने भी विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। आकृति सिंह ने साहित्य को जीवन मूल्यों का आधार बताया, जबकि शशि प्रभा ने कहा कि साहित्य युवाओं को सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता प्रदान करता है। अंजलि तिवारी ने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताया। सोमांशी शुक्ला ने कहा कि साहित्य युवाओं में सकारात्मक सोच विकसित करता है। सूर्यांश ने साहित्य को व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण साधन बताया। संध्या मौर्य ने कहा कि साहित्य युवाओं को जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देता है। आदर्श विश्वास ने साहित्य को समाज की वास्तविकताओं का प्रतिबिंब बताया।

आर्या मिश्रा ने कहा कि साहित्य के माध्यम से युवाओं में मानवीय संवेदनाओं का विकास होता है। रीतू शुक्ला ने साहित्य को नैतिक मूल्यों का संवाहक बताया, जबकि गौरव गौड़ ने कहा कि साहित्य युवाओं को सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति जागरूक करता है। संध्या यादव ने साहित्य को जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला माध्यम बताया।

जैनब फातिमा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य युवाओं को अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करता है। आज के डिजिटल युग में साहित्य का अध्ययन युवाओं को विवेकपूर्ण सोच, संवेदनशीलता और आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि साहित्य के माध्यम से युवा अपनी पहचान को समझते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकते हैं। कार्यक्रम का संचालन बी.ए. प्रथम सेमेस्टर की छात्रा जैनब फातिमा ने किया। इस अवसर पर बी ए अंग्रेजी प्रथम, तृतीय और पंचम सेमेस्टर के विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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