Edgar Lungu: 8 महीने से नहीं दफनाया गया राष्ट्रपति का शव, मौत के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रहा ये विवाद

Edgar Lungu: जांबिया के पूर्व राष्ट्रपति एगार लंगू की मृत्यू को अब आठ महीने से अधिक का समय हो चुका है, मगर उनका शव अभी तक दफन नहीं किया गया है। 5 जून 2025 को साउथ अफ्रीका में हुई उनकी मृत्यु के बाद से यह मामला विवादों में घिरा हुआ है। लंगू की उम्र उस समय 68 साल थी और उनकी मौत सर्जरी संबंधित समस्याओं के कारण हुई थी। मगर यह सवाल अब भी बरकरार है कि उनका अंतिम संस्कार किस प्रकार से होगा।
जानें पूरा मामला
जांबिया के वर्तमान राष्ट्रपति हाकाइंडे हिचलेमा ने यह निर्णय लिया है कि लंगू का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाए। उनका मानना है कि एक पूर्व राष्ट्रपति को इस सम्मान के साथ विदा दी जानी चाहिए। मगर लंगू के परिवार का कहना है कि वह अपने प्रियजन का अंतिम संस्कार एक निजी और पारिवारिक समारोह के रूप में चाहते हैं। परिवार के अनुसार, लंगू ने हमेशा हिचलेमा से दूरी बनाए रखी थी और वे नहीं चाहते थे कि हिचलेमा उनके शव के पास आएं।
यह मुद्दा अब अदालत तक पहुंच चुका है। जांबिया की अदालत ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है और कहा है कि लंगू का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ होना चाहिए। हालांकि, लंगू का परिवार इस निर्णय से संतुष्ट नहीं है और अपनी मांगों पर अड़ा हुआ है। उनका कहना है कि लंगू की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए और उनके अंतिम संस्कार को निजी रखा जाना चाहिए।
इस पूरे मामले को लेकर जांबिया की जनता में भी आक्रोश और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। बहुत से लोग मानते हैं कि लंगू की मृत्यू अब एक राजनीतिक ड्रामा बन चुकी है। जांबिया में एक मान्यता है कि मरने के बाद कहा गया हर शब्द किसी व्यक्ति के भविष्य के लिए शुभ या अशुभ साबित हो सकता है। कई लोग यह मानते हैं कि लंगू ने राष्ट्रपति हिचलेमा को श्राप दिया था और अब हिचलेमा इस श्राप से बचने के लिए उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान के साथ करने की कोशिश कर रहे हैं।
पूर्व राष्ट्रपति और हिचलेमा के बीच का संघर्ष कैसा था
लंगू और हिचलेमा के बीच का राजनीतिक इतिहास भी संघर्षपूर्ण रहा है। दोनों के बीच चुनावी मुकाबले, जेल में बंद होने के अनुभव और सत्ता की राजनीति को लेकर विवाद रहे हैं। ऐसे में लंगू की मृत्यू के बाद भी यह विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। इसके अलावा, कुछ लोग मानते हैं कि इस विवाद का असर जांबिया की राजनीति पर भी पड़ सकता है और यह मुद्दा आगे भी चर्चा का विषय बना रहेगा।
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हालांकि, लुसाका में लंगू की कब्र को तैयार किया जा चुका है, मगर अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उनका अंतिम संस्कार कब होगा। एक ओर जहां सरकार अपनी ओर से राजकीय सम्मान की तैयारी कर रही है, वहीं लंगू का परिवार अपनी मांगों पर अड़ा हुआ है। अब देखना यह है कि यह विवाद कब और किस रूप में समाप्त होगा, और कब लंगू को उनकी अंतिम यात्रा की मंजिल मिलेगी।



