कभी दूसरों ने उड़ाया मजाक, आज एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड मेडलिस्ट; जानें कौन हैं दीप्ति जीवनजी

Deepthi Jeevanji Gold Medal: भारतीय पैरा-एथलेटिक्स की स्टार धाविका दीप्ति जीवनजी ने अंतरराष्ट्रीय ट्रैक पर एक बार फिर तिरंगा लहराते हुए स्वर्णिम इतिहास रच दिया है। एशियन पैरा गेम्स में महिलाओं की 400 मीटर T20 स्पर्धा के रोमांचक फाइनल में दीप्ति ने महज 56.36 सेकंड का समय निकालते हुए न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि खेलों का नया रिकॉर्ड भी स्थापित कर दिया।
इस कड़े मुकाबले में जापान की नीना कानो को रजत और अकाने काटो को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। पेरिस पैरालंपिक्स में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीतने के बाद दीप्ति की यह असाधारण उपलब्धि दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और कड़े अभ्यास के आगे बड़ी से बड़ी शारीरिक और सामाजिक बाधाएं घुटने टेक देती हैं।
जमकर उपहास उड़ाते थे गांव वाले, आज कर रहे हैं गर्व
दीप्ति का यह स्वर्णिम सफर बेहद दर्द और संघर्षों की भट्टी में तपकर निकला है। 27 सितंबर 2003 को तेलंगाना के वारंगल जिले के सुदूर कालेडा गांव में एक बेहद निर्धन खेतिहर मजदूर परिवार में जन्मीं दीप्ति जन्मजात बौद्धिक अक्षमता (इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी) से जूझ रही थीं। बचपन में उनके रूप-रंग और मानसिक स्थिति को लेकर गांव के लोग उनका जमकर उपहास उड़ाते थे और माता-पिता को ताने सहने पड़ते थे, मगर दीप्ति के कदमों में छिपी अद्भुत रफ्तार ने उनकी किस्मत बदल दी।
गांव के स्कूल में शारीरिक शिक्षा शिक्षक बियानी वेंकटेश्वरलू ने सबसे पहले उनकी तेज स्प्रिंट क्षमता को पहचाना और उन्हें 100 व 200 मीटर दौड़ के लिए तराशना शुरू किया। इसके बाद 2019 की एक राज्य स्तरीय मीट में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के द्रोणाचार्य अवार्डी कोच एन. रमेश की नजर उन पर पड़ी, जिन्होंने परिवार को समझाकर दीप्ति को हैदराबाद की आधुनिक ट्रेनिंग अकादमी में दाखिला दिलाया।
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हैदराबाद में पेशेवर कोचिंग मिलने के बाद दीप्ति ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वैश्विक स्तर पर भारत का परचम फहराया। इससे पहले उन्होंने 2023 के हांगझोऊ एशियाई पैरा खेलों में 56.69 सेकंड का समय निकालकर गेम्स और एशियाई रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीता था, जबकि 2024 में जापान के कोबे में आयोजित विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में विश्व रिकॉर्ड तोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया था। लगातार दो एशियाई पैरा खेलों में स्वर्णिम सफलता दोहराने वाली वारंगल की यह बेटी आज उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो सीमित संसाधनों और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद अपने सपनों को सच करने का हौसला रखते हैं।



