चीन मुद्दा और जनरल नरवणे की किताब: क्या राहुल गांधी के पास है कोई ‘विस्फोटक’ जानकारी जिससे हिल जाएगी सरकार

संसद में आजकल काम कम और संग्राम ज्यादा देखने को मिल रहा है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने मोर्चा खोल रखा है। उन्हें पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का सहारा लिया गया है। लोकसभा अध्यक्ष पर पक्षपातपूर्ण तरीके से सदन संचालित करने, कांग्रेस सदस्यों पर झूठे इल्जाम लगाने तथा अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप मढ़ा गया है।

वैसे ओम बिरला बेहद व्यवहार कुशल एवं काबिल व्यक्ति हैं। सदन का नियमानुसार संचालन करने में वह पारंगत हैं। सदन में नियम टूटने पर वह सदस्यों पर बिफर पड़ते हैं। उन्हें नियमों का पालन करने की सीख देते हैं।

कांग्रेस सांसदों पर गंभीर आरोप

अविश्वास प्रस्ताव के इतर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस सांसदों पर गंभीर आरोप लगाया है। रिजिजू का कहना है कि कुछ सांसदों ने लोकसभा स्पीकर के चेंबर में घुसकर उनके साथ दुर्व्यवहार किया। यह भी आरोप है कि प्रियंका गांधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल जैसे कांग्रेस के सीनियर लीडर अपने सांसदों को उकसा रहे थे। संसद में मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है ताकि सरकार के मनमाने अथवा गलत फैसलों का खुलकर विरोध किया जा सके, मगर विपक्ष को यह अधिकार कतई नहीं कि वह लोकसभा स्पीकर के आदेश की नाफरमानी कर उनके संग बुरा बर्ताव करे।

संसद के दोनों सदनों का शांतिपूर्ण एवं सुचारू ढंग से संचालित होना देशहित में आवश्यक है। चूंकि वहां राष्ट्र के विकास एवं मजबूती के लिए योजनाओं को मंजूरी दी जाती है। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव इसलिए लाया गया चूंकि उन्होंने राहुल गांधी को सदन में बोलने का मौका नहीं दिया। साफ है कि राहुल और उनके सहयोगी यह साबित करना चाह रहे हैं कि नेता प्रतिपक्ष चीन के मसले में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक के एक पत्रिका में छपे कथित अंशों के जरिए जो कुछ कहना चाह रहे हैं, वह इतना विस्फोटक और सनसनीखेज है कि मोदी सरकार संकट में पड़ जाएगी। यह एक तरह का दिवास्वप्न ही है, क्योंकि सब जानते हैं कि पिछले छह साल में राहुल गांधी के ऐसे बयानों का कहीं कोई असर नहीं पड़ा।

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सच्चाई तो यह है कि उनके वे बयान भी असरहीन रहे, जिन्हें उन्होंने एटम बम आदि की संज्ञा दी थी। फिलहाल कहना मुश्किल है कि इस अविश्वास प्रस्ताव का क्या हश्र होगा, मगर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कुछ समय पूर्व विपक्ष ने राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की थी। आसार यही हैं कि जैसे वह अविश्वास प्रस्ताव कहीं नहीं पहुंच सका था, उसी प्रकार इस अविश्वास प्रस्ताव का भी कोई भविष्य नहीं। संसद की कार्रवाई को बार-बार बाधित कर विपक्ष अच्छा नहीं कर रहा है।

आमजन के मध्य इसका गलत संदेश पहुंच रहा है। भविष्य में देश के कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। चूंकि विपक्ष के पास जनता को प्रभावित करने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं है, इसलिए वह बेवजह के विवादों को हवा देकर अपनी दाल को गलाने का प्रयास कर रहा है। हालांकि इस प्रकार की कसरत से उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का एकमात्र मकसद मोदी सरकार की छवि को खराब करना रह गया है। विपक्ष जब तक गलत रास्ते पर चलता रहेगा, तब तक उसका भविष्य सुनहरा नहीं हो सकेगा। विपक्ष को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है।

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