जीवन आइसक्रीम की तरह,पिघल रहा हर पल: मुनिश्री भाव सागर
जड़,जोरू और जमीन को लेकर होते हैं अधिकांश विवाद

जसवंतनगर,इटावा। अमृतमय चातुर्मास के अंतर्गत गुरुवार को मुनि श्री108 भाव सागर महाराज ने मंगल प्रवचन में जीवन,संस्कृति,संयम और आत्मकल्याण से जुड़े विषयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य को संसार में रहते हुए भी उससे अप्रभावित रहना सीखना चाहिए। समता और आत्मचिंतन ही आत्मिक विकास का मार्ग है।
मुनिश्री ने कहा कि संसार में अधिकांश विवाद जड़, जोरू और जमीन को लेकर होते हैं। महाभारत और रामायण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इन महाकाव्यों में वर्णित संघर्षों के पीछे भी पारिवारिक और सामाजिक कारण प्रमुख रहे हैं। इसलिए मनुष्य को मोह-माया और विवादों से ऊपर उठकर जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।
पाश्चात्य प्रभाव से संस्कृति पर असर
उन्होंने वर्तमान समय में प्रसारित होने वाले अनेक टीवी सीरियलों पर चिंता जताते हुए कहा कि पाश्चात्य प्रभाव और भ्रामक प्रस्तुतियों से भारतीय संस्कृति एवं संस्कार प्रभावित हो रहे हैं। समाज को अपनी सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और जीवन मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि संसार में सामान्य बने रहना सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि हर व्यक्ति स्वयं को विशेष साबित करने में लगा है। जबकि वस्तु का स्वभाव सामान्य रहना है। सादगी,सहजता और विनम्रता ही जीवन की वास्तविक सुंदरता है।
आत्मा में रमण ही वास्तविक ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि आत्मा में रमण करना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। जब मनुष्य बाहरी विषयों से हटकर आत्मचिंतन की ओर बढ़ता है,तभी जीवन पवित्र,संयमित और सार्थक बनता है।
प्रवचन के अंत में मुनिश्री ने जीवन की तुलना आइसक्रीम से करते हुए कहा कि जीवन लगातार पिघल रहा है। इसलिए इसे नियम,संयम और सदाचार के साथ जीना चाहिए। मनुष्य को समय का सदुपयोग करते हुए धर्म,संयम और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।



