Sarvam AI भारत का अपना ChatGPT, जानिए क्या हैं खास बातें

Sarvam AI: अब तक एआई क्षेत्र में मुकाबला मुख्य रूप से अमेरिका और चीन के बीच देखा जाता था। चैटजीपीटी और जेमिनाई जैसे मॉडल अमेरिकी कंपनियों के हैं, जबकि चीन के पास डीपसीक, बायडू और अलीबाबा जैसे प्लेटफॉर्म हैं। भारत को लंबे समय तक एक ऐसे देश के रूप में देखा गया जहां इंजीनियर तो हैं, लेकिन प्लेटफॉर्म बाहर के हैं।
सर्वम एआई इस धारणा को चुनौती देता है। यह कोई साधारण ऐप नहीं बल्कि एक फाउंडेशन लेवल एआई मॉडल है, जिसे पूरी तरह देश के भीतर तैयार किया गया है।
एआई एप्लिकेशन नहीं, बल्कि डिजिटल रीढ़
सर्वम एआई को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि एआई टूल और एआई फाउंडेशन मॉडल में बड़ा फर्क होता है। भारत में कई स्टार्टअप एआई आधारित सेवाएं बनाते हैं, लेकिन उनकी नींव विदेशी मॉडलों पर टिकी होती है।
सर्वम एआई इस मामले में अलग है। इसका प्रशिक्षण भारतीय डाटा से हुआ है। इसका नियंत्रण भारतीय सर्वर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। यही कारण है कि इसे सॉवरेन एआई मॉडल कहा जा रहा है। यानी डाटा पर भी भारत का अधिकार और तकनीक पर भी।
भारतीय दस्तावेज और भाषाओं में मजबूत प्रदर्शन
रिपोर्ट्स के अनुसार Sarvam AI ने ओसीआर और मल्टीलिंगुअल कार्यों में उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। अंग्रेजी ओसीआर में इसकी सटीकता 84 प्रतिशत से अधिक बताई गई है, जबकि भारतीय भाषाओं में यह आंकड़ा 93 प्रतिशत से ऊपर है।
सरकारी फाइलें, स्कैन किए गए दस्तावेज, जटिल फॉर्मेट और कोड फाइलें, जिनमें कई विदेशी एआई मॉडल अटक जाते हैं, उन्हें सर्वम बेहतर तरीके से समझ पा रहा है। इसकी वजह साफ है। यह भारतीय दस्तावेजों की संरचना और भाषाई पैटर्न से परिचित है।
आवाज जो भारतीय लगे
टेक्स्ट टू स्पीच और वॉइस टेक्नोलॉजी में दुनिया भर में कई नाम हैं, लेकिन अक्सर भारतीय यूजर्स को उनमें एक दूरी महसूस होती है। उच्चारण स्थानीय नहीं लगता और कई भाषाएं सपोर्ट में ही नहीं होतीं।
सर्वम एआई का बुलबुल वर्जन इस कमी को दूर करने की कोशिश करता है। यह 35 से ज्यादा भाषाओं को सपोर्ट करता है, जिनमें 11 से अधिक भारतीय भाषाएं शामिल हैं। लक्ष्य है आने वाले समय में 20 से ज्यादा भाषाओं तक पहुंचना। सबसे अहम बात यह है कि आवाज में स्थानीय लहजा और भारतीय टोन सुनाई देता है।
90 प्रतिशत भारत के लिए एआई
भारत की बड़ी आबादी अंग्रेजी में सहज नहीं है। अनुमान के मुताबिक केवल 10 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी आधारित डिजिटल टूल्स का पूरा फायदा उठा पाते हैं। ऐसे में विदेशी एआई मॉडल सीमित वर्ग तक ही पहुंच बनाते हैं।
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भारतीय भाषाओं में काम करने वाला एआई इस खाई को पाट सकता है। जब किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी या छात्र अपनी भाषा में तकनीक से बात कर पाएंगे, तभी एआई वास्तव में जनसामान्य की तकनीक बनेगा।



