क्या नेहरू ने नेपाल के राजा को भी काठमांडू से उठा लिया था, वेनेजुएला के मौके पर उस ऐतिहासिक घटना की चर्चा

US के वेनेजुएला के प्रेसिडेंट को अरेस्ट करने के बाद इतिहास की एक अहम घटना पर चर्चा हो रही है। US मिलिट्री ने वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो को पकड़ लिया है, जिससे ग्लोबल पॉलिटिक्स में हलचल मच गई है। इस घटना ने साउथ एशियन देशों में एक ऐतिहासिक घटना की यादें ताज़ा कर दी हैं।
1950 में जब नेपाल का वजूद खतरे में था, तब भारत के उस समय के प्राइम मिनिस्टर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नेपाल के राजा त्रिभुवन को जो मदद दी थी, वह आज फिर चर्चा में आ गई है।
सन् 1950 के दशक में नेपाल में असली ताकत राणा वंश के पास थी और राजा सिर्फ़ नाम के मुखिया थे। राणा के ज़ालिम राज की वजह से राजा त्रिभुवन की जान खतरे में थी। ऐसे समय में भारत ने नेपाल की डेमोक्रेसी के साथ खड़े होने का फ़ैसला किया।
6 नवंबर 1950 को राजा त्रिभुवन और उनके परिवार ने काठमांडू में इंडियन एम्बेसी में शरण ली, यह कहकर कि वे घूमने गए हैं। राणा ने उन्हें अरेस्ट करने की कोशिश की लेकिन इंडिया ने उन्हें बचाया।
उसी दिन एक स्पेशल प्लेन दिल्ली से काठमांडू के लिए उड़ा। इंडिया नेपाल के राजा को सेफली दिल्ली ले आया। पंडित नेहरू खुद उनके वेलकम के लिए एयरपोर्ट गए, जो उस समय एक बड़ा डिप्लोमैटिक कदम था।
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इंडिया ने साफ कर दिया कि वह राजा त्रिभुवन को नेपाल का ऑफिशियल हेड मानेगा। नेहरू ने राणा शासन पर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के लिए प्रेशर डाला। नेहरू की मीडिएशन से 1951 में ‘दिल्ली अकॉर्ड’ साइन हुआ। इस एग्रीमेंट ने कई सालों तक चले राणा के राज को खत्म कर दिया और नेपाल में डेमोक्रेसी की नींव रखी। राजा त्रिभुवन नेपाल की गद्दी पर वापस आ गए। इंडिया की इस मदद की वजह से ही नेपाल की सॉवरेनिटी बची रही।
वेनेजुएला की घटना (venezuela news) से इसका क्या है कनेक्शन
आज जब अमेरिका एक राष्ट्राध्यक्ष (मादुरो) को हिरासत में ले रहा है, तो नेपाल के लोग याद कर रहे हैं कि भारत ने कभी नेपाल पर कब्ज़ा करने की कोशिश नहीं की। भारत ने हमेशा संकट के समय नेपाली राजशाही और उसके लोगों की मदद की है।



