JNU से संसद तक; Kanhaiya Kumar कितने चुनाव हार चुके हैं, देखिए पूरी लिस्ट

DUSU Election Result 2026: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की छात्र राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार के सक्रिय चुनावी राजनीति में आए करीब एक दशक बीत चुका है। हालांकि, बड़े चुनावी मैदानों में जीत दर्ज करना आज भी उनके लिए एक अधूरा सपना बना हुआ है। लेफ्ट की राजनीति से निकलकर कांग्रेस में शामिल होने और पार्टी बदलने के बावजूद मुख्यधारा के मतदाताओं ने उन्हें लगातार खारिज किया है। इसका सबसे ताजा झटका दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजों में देखने को मिला है, जहां कांग्रेस की छात्र शाखा नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) चारों सीटों पर बुरी तरह धराशायी हो गई।

कन्हैया कुमार की साख को बड़ा झटका, बागी प्रत्याशी ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत

डीयू छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस और एनएसयूआई की पूरी कमान राष्ट्रीय प्रभारी के रूप में कन्हैया कुमार के हाथों में थी। वे युवा मोर्चे पर पार्टी का सबसे प्रमुख और मुखर चेहरा माने जाते हैं। इसके बावजूद एनएसयूआई न केवल चारों प्रमुख सीटों पर हारी, बल्कि उपाध्यक्ष पद पर कांग्रेस के ही बागी उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने शानदार जीत हासिल कर संगठन को आईना दिखा दिया। गौर करने वाली बात यह है कि चुनाव से ठीक पहले कन्हैया कुमार के दखल के चलते ही दीपांशु शौकीन का टिकट काटा गया था। जीत के बाद दीपांशु ने बिना नाम लिए कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और कन्हैया कुमार के फैसलों पर तीखा प्रहार किया।

‘जो नेता जेन जी को नहीं समझ सकते, उन्हें बागडोर नहीं मिलनी चाहिए’: दीपांशु शौकीन

उपाध्यक्ष पद जीतने वाले बागी नेता दीपांशु शौकीन ने एक इंटरव्यू में संगठन की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ और उनका संदेश नई पीढ़ी यानी जेन जी (Gen Z) तक इसलिए नहीं पहुंच पाया, क्योंकि एनएसयूआई के शीर्ष पदाधिकारी न तो युवाओं की नब्ज को समझ पाए और न ही उन जमीनी कार्यकर्ताओं की कद्र की जो दिन-रात छात्रों के बीच रहते हैं। शौकीन ने दो टूक कहा कि जो नेता आधुनिक पीढ़ी की आकांक्षाओं को नहीं समझ सकते, उन्हें छात्र संगठन की इतनी बड़ी बागडोर नहीं सौंपी जानी चाहिए।

पार्टी के भीतर भी घिरे कन्हैया, टिकट वितरण पर खड़े हुए सवाल

डीयू चुनाव के अप्रत्याशित नतीजों के बाद कांग्रेस समर्थकों और सोशल मीडिया पर कन्हैया कुमार की भूमिका को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। पार्टी के कई अंदरूनी हलकों में हार का ठीकरा सीधे कन्हैया कुमार के सिर फोड़ा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, गलत टिकट वितरण और जमीनी समीकरणों की अनदेखी को लेकर उन्हें आलाकमान के स्तर पर भी कड़ी नाराजगी का सामना करना पड़ा है। लगातार मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक बयानबाजी करने और राहुल गांधी के करीबी होने के बावजूद चुनावी रणनीति में उनकी विफलता पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष का कारण बन रही है।

बेगूसराय से उत्तर-पूर्वी दिल्ली तक: लोकसभा चुनावों में भी नहीं चला जादू

यह पहला मौका नहीं है जब चुनावी मैदान में कन्हैया कुमार को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो। जेएनयू विवाद के बाद जब वे अपनी मूल पार्टी सीपीआई (CPI) में शामिल हुए, तो पार्टी ने उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की बेगूसराय सीट से उतारा। उस मुकाबले में भाजपा के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह ने उन्हें 4 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। इस करारी हार के बाद सीपीआई में उनके संबंध बिगड़े और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। इसके बाद सितंबर 2021 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने 2024 के आम चुनाव में उन्हें उत्तर-पूर्वी दिल्ली से भाजपा के मौजूदा सांसद मनोज तिवारी के खिलाफ मैदान में उतारा। ‘इंडिया’ गठबंधन के पूरे प्रचार तंत्र और संसाधनों के बावजूद कन्हैया यह मुकाबला भी लगभग 1.5 लाख वोटों के बड़े अंतर से हार गए।

सपा ने क्यों मांगी हर जिले की इन 5 बड़ी समस्याओं की लिस्ट, अखिलेश की रणनीति समझिए

पंजाब से लेकर दिल्ली तक संगठन की स्थिति चिंताजनक

डीयू से पहले हाल ही में संपन्न हुए पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनावों में भी एनएसयूआई का प्रदर्शन निराशाजनक रहा, जहां पार्टी चार में से एक भी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। वहां भी बागियों के प्रभाव ने संगठन को गहरा नुकसान पहुंचाया। हालांकि, उत्तराखंड की गढ़वाल यूनिवर्सिटी के पौड़ी कैंपस में जरूर एनएसयूआई ने सभी पदों पर जीत हासिल कर अपनी लाज बचाई। छात्र राजनीति में ऐसे समय में ये हार सामने आई हैं जब राहुल गांधी देश भर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए छात्रों के ज्वलंत मुद्दों को उठा रहे हैं और युवाओं को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में कन्हैया कुमार के नेतृत्व पर उठ रहे सवाल कांग्रेस के छात्र संगठन के भविष्य के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।

Related Articles

Back to top button