दुनिया का वो देश जहां गाड़ियों में पेट्रोल नहीं, सीधे गन्ने का रस भरा जाता है!

देश के वाहन चालकों के बीच इन दिनों एक नए बदलाव को लेकर भारी नाराजगी और असंतोष का माहौल देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों ऐसे कई वीडियो और पोस्ट तेजी से वायरल हो रहे हैं जिनमें लोग अपनी गाड़ियों का माइलेज घटने का दावा कर रहे हैं। आम उपभोक्ताओं का सीधा आरोप है कि पेट्रोल में बढ़ती एथेनॉल की मात्रा के कारण उनके वाहनों की परफॉर्मेंस पर बुरा असर पड़ रहा है।

हालांकि इस जन-आक्रोश के बीच एक बड़ी हकीकत यह भी है कि सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया का हर बड़ा देश कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता घटाने और प्रदूषण को कम करने के लिए बायोफ्यूल ब्लेंडिंग की राह पर आगे बढ़ चुका है।

जानें किस देश में कितना मिलाया जाता है एथेनॉल

अगर वैश्विक स्तर पर देखें तो इस हरित ईंधन क्रांति का असली अगुआ ब्राजील देश है। वहां का सिस्टम देखकर कोई भी हैरान रह सकता है क्योंकि ब्राजील में सामान्य पेट्रोल के भीतर कम से कम 27 फीसदी एथेनॉल मिलाना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। वहां फ्लेक्स फ्यूल तकनीक इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि लोग अपनी गाड़ियों में 100 प्रतिशत शुद्ध एथेनॉल भी भरवाते हैं जिसे वे गन्ने की फसल से तैयार करते हैं।

दूसरी ओर दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक अमेरिका मुख्य रूप से मक्के की खेती के जरिए इसे तैयार करता है। यूएसए में फिलहाल 10 प्रतिशत का मानक मॉडल चल रहा है जिसे अब अपग्रेड करके 15 प्रतिशत करने की तैयारी की जा रही है ताकि इंजन की क्षमता और पर्यावरण दोनों का संतुलन बना रहे।

भारत का मास्टर प्लान और हजारों करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत

भारतीय बाजार में एथेनॉल के सफर ने बीते कुछ सालों में अद्भुत रफ्तार पकड़ी है। साल 2014 के दौर में जहां पेट्रोल में इसकी मिलावट सिर्फ डेढ़ से ढाई फीसदी के आसपास सिमटी हुई थी वहीं आज भारत 10 प्रतिशत का पड़ाव पार कर 20 फीसदी यानी E20 के लक्ष्य को छूने के बेहद करीब है। सरकार की योजना इस मास्टर प्लान को 2025-26 तक पूरे देश में पूरी तरह लागू करने की है।

भारत में इसे गन्ने के रस, भारी शीशे और खराब हो चुके चावल या मक्के जैसे अनाजों से रिफाइन किया जा रहा है। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे देश का सालाना हजारों करोड़ रुपया बच रहा है जो पहले कच्चे तेल के आयात में विदेशों में चला जाता था। साथ ही इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की जेब में भी सीधा पैसा पहुंच रहा है।

जापान का अनोखा और सबसे सुरक्षित हाईटेक ईटीबीई मॉडल

इन सब से अलग दुनिया के सबसे उन्नत ऑटोमोबाइल बाजार जापान ने एक बिल्कुल जुदा और सुरक्षित रास्ता अख्तियार किया है। जापान अपनी गाड़ियों में सीधे तौर पर एथेनॉल मिलाने से परहेज करता है क्योंकि वहां के विशेषज्ञों का मानना है कि डायरेक्ट मिक्सिंग से पुराने इंजनों और फ्यूल पाइपलाइनों में जंग लगने का खतरा बहुत बढ़ जाता है।

सिर्फ़ यादें बची हैं; इस अनोखे गाँव में इंसानों से ज़्यादा मूर्तियां हैं, वजह आपको हैरान कर देंगी

इसी तकनीकी खामी से बचने के लिए जापानी वैज्ञानिक एक खास केमिकल प्रोसेस के जरिए एथेनॉल को ईटीबीई यानी इथाइल टर्टाइरी ब्यूटाइल ईथर में बदल देते हैं। इसके बाद इस तत्व को पेट्रोल में मिक्स किया जाता है जो बिना किसी तकनीकी खराबी के इंजन को पूरी तरह सुरक्षित रखता है। हालांकि अब जापान भी भविष्य को देखते हुए भारत और ब्राजील के डायरेक्ट फ्लेक्स फ्यूल मॉडल का बारीकी से अध्ययन कर रहा है।

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