पश्चिम बंगाल में खलबली! 8000 मदरसों पर गिरने वाली है गाज? सरकार ने उठाया बड़ा कदम

madarsa education row 2026: पश्चिम बंगाल में भारी तादाद में संचालित मदरसों की जांच की तैयारी तेज हो गई है। सरकारी स्तर पर ऐसे मदरसों का पूरा ब्योरा जुटाया जा रहा है जो निजी तौर पर चल रहे हैं या जिनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इस कदम को लेकर अल्पसंख्यक संगठनों ने चिंता जताई है। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रशासन यह जानना चाहता है कि इन संस्थानों को धन कहां से मिल रहा है। वहां कौन सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है और शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता क्या है। इसके साथ ही मदरसों में होने वाली अन्य गतिविधियों की भी जानकारी एकत्र की जाएगी।

नियमों में कमी मिलने पर हो सकती है कार्रवाई

अफसरों का कहना है कि जांच के दौरान यदि किसी मदरसे में गंभीर अनियमितता मिलती है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। शिक्षा के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं की भी समीक्षा होगी। यदि किसी संस्थान के बारे में यह पता चलता है कि वह अवैध रूप से कब्जाई गई जमीन पर बना है तो उसे हटाने तक का फैसला लिया जा सकता है।

सरकार के वरिष्ठ अफसरों के मुताबिक पहले ऐसी विस्तृत जानकारी कभी नहीं जुटाई गई थी। उनका कहना है कि मामला संवेदनशील है इसलिए फिलहाल ज्यादा विवरण साझा नहीं किया जा सकता। हालांकि यदि विदेशी फंडिंग या अन्य संदिग्ध गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं तो कार्रवाई से पीछे नहीं हटेंगे।

जिलों से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट

राज्य सरकार ने 5 जून को जिला अफसरों को संदिग्ध और गैर-पंजीकृत मदरसों की सूची भेजी थी। सभी जिलाधिकारियों से 5 जुलाई तक रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई शुरू हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार फंडिंग की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) भी बनाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि राज्य में करीब 8000 ऐसे मदरसे हैं जो इस समीक्षा प्रक्रिया के दायरे में आ सकते हैं।

पुराने आंकड़ों को लेकर भी सवाल

पश्चिम बंगाल की पिछली सरकारों ने मदरसों की कुल संख्या से जुड़े विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए थे। हालांकि एक अधिकारी के अनुसार वर्ष 2015 में राज्य में लगभग 11 हजार मदरसे मौजूद थे।

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2014 के खागरागढ़ विस्फोट मामले की जांच के दौरान राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कहा था कि कुछ खारिजी मदरसों में जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश जैसे संगठनों की गतिविधियों के संकेत मिले थे। एजेंसी ने यह भी दावा किया था कि कुछ स्थानों पर बच्चों को कट्टरपंथ की ओर प्रभावित करने की कोशिश की जा रही थी।

सभी मदरसे एक जैसे नहीं

राज्य में 601 ऐसे मदरसे भी हैं जिन्हें सरकार से आर्थिक सहायता नहीं मिलती लेकिन उनका पाठ्यक्रम सरकारी मानकों के अनुसार स्वीकृत है। ऐसे संस्थानों को स्थानीय स्तर पर नेताओं या अन्य स्रोतों से वित्तीय सहयोग मिल सकता है।

इसके अलावा सरकारी सहायता प्राप्त और पंजीकृत गैर-सहायता प्राप्त मदरसे भी संचालित होते हैं। इनमें पश्चिम बंगाल बोर्ड के दिशा-निर्देशों के अनुसार पढ़ाई कराई जाती है। साथ ही अरबी भाषा और धार्मिक विषयों की शिक्षा अलग से दी जाती है।

क्या होते हैं खारिजी मदरसे?

खारिजी मदरसे वे संस्थान माने जाते हैं जो पारंपरिक धार्मिक शिक्षा प्रणाली के आधार पर चलते हैं और किसी औपचारिक शिक्षा बोर्ड से जुड़े नहीं होते। इनका संचालन आमतौर पर मस्जिद समितियां, वक्फ संस्थाएं या उलेमा समूह करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक विद्वानों और मौलवियों को तैयार करना होता है।

वर्ष 2002 में प्रकाशित 141 पन्नों की एक रिपोर्ट में ऐसे संस्थानों की पहचान और निगरानी की जरूरत बताई गई थी। बाद में तृणमूल कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने पर लगभग 10 हजार मदरसों को मान्यता देने की योजना घोषित की गई।

मान्यता प्रक्रिया में सीमित आवेदन

राज्य सरकार ने उस समय स्पष्ट किया था कि मान्यता पाने के इच्छुक मदरसों को अपनी पूरी जानकारी जमा करनी होगी। इसी कारण करीब 1400 संस्थानों ने आवेदन किया। इनमें से केवल 235 मदरसों को मान्यता मिली।

इसके बाद 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले लगभग 366 अतिरिक्त मदरसों को मान्यता प्रदान की गई। अब राज्य सरकार की नई जांच प्रक्रिया के चलते एक बार फिर मदरसा व्यवस्था चर्चा के केंद्र में आ गई है।

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