अगर 3 साल पहले खरीदा होता सोना तो पछताते, चांदी के इस तूफानी रिटर्न के आगे फेल हुए सारे बैंक-FD

Gold vs Silver Returns: भारतीय परिवारों में सोना और चांदी सिर्फ आभूषण या परंपरा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संकट के समय सबसे मजबूत वित्तीय सहारा और मुनाफे का साधन भी माने जाते हैं। हाल के वर्षों में दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है, लेकिन आम निवेशकों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि एक लाख रुपये के निवेश पर असली बाजी किसने मारी। इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के 999 शुद्धता वाले बेंचमार्क आंकड़ों के विश्लेषण से साफ होता है कि रिटर्न का यह खेल पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने पैसा कितने समय के लिए लगाया है।
चांदी ने सोने को सीधे तौर पर पछाड़ दिया
कम और मध्यम अवधि यानी पिछले 1 साल और 3 साल के प्रदर्शन को परखें तो चांदी ने सोने को सीधे तौर पर पछाड़ दिया है। बीते एक साल की बात करें तो नवंबर 2025 में चांदी में लगाया गया ₹1 लाख का निवेश बढ़कर करीब ₹1.18 लाख हो गया, जबकि इसी दौरान सोने में ₹1 लाख लगाने वाले निवेशक को लगभग ₹1.14 लाख मिले।
वहीं 3 साल के नजरिए से देखें तो दोनों के बीच का अंतर और ज्यादा बड़ा हो जाता है। पिछले 3 सालों में चांदी ने करीब 149.29% का बंपर रिटर्न देकर ₹1 लाख के निवेश को ₹2.49 लाख बना दिया, जबकि सोने ने 125.26% की बढ़त के साथ ₹1 लाख की वैल्यू ₹2.25 लाख तक पहुंचाई।
लंबी अवधि यानी 5 साल के निवेश चक्र में तस्वीर थोड़ी पलट जाती है और सोना बाजी मारता दिखता है। पांच साल पहले सोने में डाला गया ₹1 लाख का फंड आज बढ़कर लगभग ₹2.88 लाख हो चुका है, जबकि चांदी में यही रकम करीब ₹2.79 लाख तक पहुंच पाई। हालांकि पांच साल में यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन स्थिरता के मामले में सोने ने लंबी अवधि के निवेशकों को थोड़ा बेहतर और सुरक्षित मुनाफा कमा कर दिया है।
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वित्तीय जानकारों का मानना है कि चांदी कम समय में सोने से कहीं अधिक तेजी से उछलती है, लेकिन इसके साथ ही इसमें उतार-चढ़ाव यानी रिस्क भी काफी अधिक रहता है। चांदी की मांग का बड़ा हिस्सा इंडस्ट्रियल सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ा होता है, इसलिए आर्थिक मंदी या औद्योगिक सुस्ती के दौर में चांदी की कीमतों में सोने के मुकाबले भारी गिरावट का खतरा बना रहता है। इसके विपरीत सोना वैश्विक संकटों और महंगाई के दौर में अधिक सुरक्षित एसेट माना जाता है, इसलिए निवेशकों को सिर्फ पिछले मुनाफे को देखकर नहीं, बल्कि अपनी जोखिम क्षमता और जरूरत के आधार पर ही पोर्टफोलियो तय करना चाहिए।



