संकट में जीवन, प्रदूषण को लेकर सरकारी उपाय क्यों हो रहे हैं विफल

वायु प्रदूषण से जूझती दिल्ली-एनसीआर: क्या हम अब भी स्वच्छ हवा की उम्मीद कर सकते हैं?

air pollotion india: दिल्ली-एनसीआर में स्वच्छ वायु का गंभीर संकट पैदा हो गया है। जहरीली हवा में सांस की लेने की यह मजबूरी नई नहीं है। पिछले कुछ साल से यह खतरनाक सिलसिला निरंतर चल रहा है। वायु गुणवत्ता बेहद चिंताजनक है। सरकारी आंकड़े एक बार फिर डरा रहे हैं। हवा के साथ शरीर में घातक कणों का प्रवेश हो रहा हैं। जानलेवा प्रदूषण की रोकथाम के उपाय नाकाफी नजर आते हैं।

सिस्टम की लाचारी नागरिकों के जीवन पर भारी पड़ रही है। वायु प्रदूषण की यह समस्या स्थायी हो चुकी है। प्रतिवर्ष की भांति दीपावली गुजरी नहीं कि समस्या फिर सामने आ गई। समूचा एनसीआर प्रदूषित वायु का दंश झेल रहा है। वायु में घुले विषैले कण शरीर को धीरे-धीरे बीमारियों का घर बन रहे है। सुरक्षित कोई नहीं है। स्वच्छ हवा किसी को नहीं मिल रही है। प्रदूषण की मार से कोई नहीं बच पा रहा है।

अब साफ हवा नसीब नहीं

किसानों और आतिशबाजी के शौकीनों के सिर दोष मढ़कर सरकार और अधिकारी अपना बचाव करने में जुटे हैं। सवाल फिर वही उठ रहा है कि क्या प्रदूषण का कोई ठोस इलाज नहीं है? क्या जहरीली हवा में सांस लेना मजबूरी बन चुका है? दिल्ली, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर, फरीदाबाद, गुड़गांव आदि-आदि फिलहाल जहां चले जाइए, साफ हवा नसीब नहीं हो सकती है।

कोरोना काल में कोरोना वायरस को जिस प्रकार अदृश्य दुश्मन बताया जाता था, उसी प्रकार इस समय भी अदृश्य शत्रु की मार बड़ी आबादी को झेलनी पड़ रही है।

भविष्य में शरीर में कब कौन सी बीमारी पनप जाएगी, कोई नहीं जानता। आज के समय में इलाज कराना भी आसान नहीं है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव है तो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के नाम पर लूट मची है। दिल्ली को पॉल्यूशन फ्री कराने के लिए विकल्प के बड़े दावे के रूप में प्रचारित कृत्रिम बारिश का प्रयोग भी सिरे नहीं चढ़ सका। अंतत: दिल्ली में यह बहु-प्रचारित प्रयोग स्थगित करना पड़ा। बल्कि बारिश की फुहारों के बजाय राजनीतिक घमासान और सवालों की बारिश के रूप में इसकी परिणति हुई।

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प्रदूषण के समाधान के लिए बहुप्रचारित असफल

राष्ट्रीय राजधानी के आकाश में छाए जहरीले धुएं को धोने के लिए जो लगभग सवा तीन करोड़ रुपए खर्च किए गए, वे बूंदाबांदी भी नहीं नहीं ला सके। इसके बाद न सिर्फ आसमान सूखा रहा बल्कि दिल्ली की उम्मीदें भी सूखी रह गईं। इसके इतर प्रदूषण के समाधान के लिए बहुप्रचारित इस प्रयोग के असफल होने के तुरंत बाद भाजपा और आप में राजनीतिक घमासान शुरू हो गया।

दरअसल कृत्रिम बारिश सिर्फ उन्ही परिस्थितियों में फलीभूत होती है जब वातावरण में पर्याप्त नमी हो, आसमान में घने बादल छाए हों तथा हवा का रुख स्थिर बना रहे। कृत्रिम बारिश के इस प्रयोग की विफलता के बावजूद भविष्य में ऐसे प्रयोगों से हाथ पीछे खींचना भी उचित नहीं होगा। बेशक इस बार बादलों ने साथ नहीं दिया, मगर भविष्य में अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। इस प्रयोग का सबक है कि लाखों नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए वैज्ञानिक संस्थानों और नागरिक एजेंसियों के मध्य बेहतर समन्वय के साथ ऐसी योजनाओं को सिरे चढ़ाना चाहिए।

वायु प्रदूषण (air pollotion india) को कम करने के लिए सभी को जिम्मेदारी निभानी होगी। खुले में कूड़ा-कचरा नहीं जलाया जाए। धूल भरे स्थानों पर नियमित रूप से पानी का छिड़काव होना चाहिए। प्रदूषणकारी फैक्ट्रियों की निगरानी कर तत्काल उचित कार्रवाई करनी चाहिए। जीवन की रक्षा के लिए स्वच्छ वायु अनिवार्य है।

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