gaza at war with israel: दिल दहला देने वाले मंजर, न बिजली न पानी, बस मौत का साया

israel के अस्तित्व में आने से पहले ही दो राष्ट्र का सिद्धांत जन्म ले चुका था। एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य। इस विवाद से हालात बहुत खराब हैं।

gaza at war with israel: जहां तक नजर जाए, वहां तक क्षतिग्रस्त इमारतें, क्षतिग्रस्त इमारतों के मलबे से अटी पड़ी सड़कें, न बिजली, ना पानी की सुविधा। भूख से तड़पते नागरिक और आसमान से रह-रहकर बरसती तबाही। वर्तमान में गाजा सिटी का यह हाल सोशल मीडिया के जरिए समूची दुनिया देख रही है। पैंसठ हजार से अधिक मौत होने के बावजूद यह संघर्ष रुक नहीं पाया है।

युद्ध रुकने की संभावना है या नहीं (Gaza israel conflict)

बात israeli hamas war की हो रही है। gaza में war with israel से शहर मानो भुतहा कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया है। आक्रामक इजरायल न रुक रहा है, ना थक रहा है। इजरायल-हमास संघर्ष के मुद्दे पर दुनिया दो हिस्सों में बंट चुकी है, मगर युद्ध रुकने की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। यह वाकई चिंता का विषय है।

Palestine की पहचान का मुद्दा क्यों अहम (Palestine israel clashes)

अमेरिका चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है। इस बीच Palestine की पहचान का मुद्दा पुन: जोर पकड़ रहा है। ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने Palestine को मान्यता प्रदान कर दी है। कुछ और देश ऐसा करने जा रहे हैं। जमीन पर बेशक इस कदम से Palestine की मौजूदा स्थिति न बदले, मगर कूटनीतिक दृष्टिकोण से ये काफी अहम है। कनाडा और ब्रिटेन जी-सेवन समूह का हिस्सा हैं। पहली बार इस समूह के सदस्य देशों ने Palestine को मान्यता देकर चौंका दिया है।

गाजा में नागरिकों की मौतों का सिलसिला जारी

अमेरिका की नाराजगी के बाद भी वाशिंगटन के सहयोगी देश यदि Palestine मुद्दे का साथ दे रहे हैं, तो इसकी बड़ी वजह गाजा के मौजूदा हालात हैं। गाजा में नागरिकों की मौतों का सिलसिला जारी है। बड़ी आबादी भुखमरी और विस्थापन झेलने को मजबूर है। इससे बड़ी त्रासदी यह है कि संघर्ष विराम के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे और इजरायल के नए ग्राउंड एक्शन से हालात और खराब हो गए हैं। कुछ दिन पहले कतर की राजधानी दोहा में इजरायलल के हवाई हमलों से भी बेचैनी बढ़ी है। इन दो देशों के मध्य का विवाद एक सदी से भी ज्यादा समय से सुलग रहा है।

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पिछली सदी में यहूदियों के लिए Palestine जमीन पर एक घर बनाने का वादा किया गया था, मगर उसमें यह भी वादा था कि वहां रह रहे दूसरे नागरिकों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। इजरायल बनने के बाद से विभिन्न कारणों से वह वादा कभी पूरा नहीं हो सका। एक आबादी को तो अपना देश मिल गया, मगर दूसरी आबादी अब भी बिना किसी पहचान के जीने को मजबूर है।

israel के अस्तित्व में आने से पहले ही दो राष्ट्र का सिद्धांत जन्म ले चुका था। एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य। इस विवाद का यही सबसे बेहतर हल भी दिखता है। दशकों से युद्ध की मार झेल रहे असंख्य नागरिक अपने घरों से बेदखल हैं। पिछले कुछ साल में इजरायल की तरफ भारत का झुकाव ज्यादा दिखा है। संयुक्त राष्ट्र में कई बार उसने इजरायल-Palestine मामले से दूरी बनाए रखी, मगर हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में टू स्टेट सॉल्यूशन पर मतदान के दौरान भारत ने इसके समर्थन में वोट दिया।

भारत में इजरायल और Palestine को लेकर नागरिकों की विभाजित है। कुछ राजनीतिक दल Palestine के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। कांग्रेस निरंतर भाजपा और पीएम मोदी पर निशाना साधती है। भाजपा को सलाह दी जाती है कि पीएम मोदी और नेतन्याहू की दोस्ती से इतर भारत का स्टैंड Palestine के पक्ष में होना चाहिए। खैर केंद्र सरकार जो भी कदम उठाएगी, वह न सिर्फ सोच-समझकर उठाएगी बल्कि देश हित का भी ध्यान रखा जाएगा।

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