BJP में घमासान, मेयर सुनीता दयाल और मयंक गोयल के बीच क्यों बढ़ा विवाद
गाजियाबाद बीजेपी में टकराव: मेयर और महानगराध्यक्ष के विवाद से पार्टी में उबाल

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। मेयर सुनीता दयाल और महानगराध्यक्ष मयंक गोयल के बीच मतभेद सामने आने से चर्चाओं का बाजार गरम है। ऐसे में विपक्ष ने ताना मारने में देरी नहीं की है।
भाजपा में संयम, सम्मान, अनुशासन और आपसी सहयोग पर जोर दिया जाता है। नगर निगम की बोर्ड बैठक तथा कार्यकारिणी समिति के छह सदस्यों के चुनाव को अवैध घोषित करने के बाद मेयर ने महानगराध्यक्ष के प्रति जिस प्रकार की टिप्पणी की है, वह सुनीता दयाल व मयंक गोयल के मध्य के मनमुटाव को उजागर करती है।
सवाल-दो दिग्गजों में टकराव बढ़ेगा या मामला निपट जाएगा
गाजियाबाद भाजपा के इन दो दिग्गजों में टकराव बढ़ेगा या मामला निपट जाएगा, यह अगले कुछ दिन में पता चल जाएगा। हालांकि दोनों के रिश्तों में कड़वाहट जरूर देखने को मिली है। नगर निगम कार्यकारिणी के जिन छह सदस्यों ने मेयर की अनुपस्थिति में खुद को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करने का ऐलान कर दिया था, उनमें से पांच भाजपा के हैं। एक सदस्य कांग्रेस का है। मेयर ने पार्षदों के कदम को सदन की गरिमा का अपमान माना है।
इसके अलावा महानगराध्यक्ष मयंक गोयल ने जिस प्रकार से निर्विरोध निर्वाचित सदस्यों से मिलकर उन्हें बधाई दी, यह बात भी मेयर को काफी अखर गई। इसके चलते उन्हें कहना पड़ा कि सदन के संचालन की जिम्मेदारी मेयर की है। कोई बाहर का व्यक्ति आकर इस कार्रवाई में दखल नहीं दे सकता। निश्चित रूप से मेयर की यह टिप्पणी मयंक गोयल को भी चुभी है। मेयर का अपनों के साथ टकराव नई बात नहीं है।
कुछ दिन पहले हाउस टैक्स के विरोध में पार्षदों ने नगर निगम मुख्यालय में बेमियादी धरना दिया था। धरने में भाजपा के कई पार्षदों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। तब यह चर्चा चल पड़ी थी कि सत्ता पक्ष के पार्षद भी मेयर के काम से खफा हैं। इसके अतिरिक्त काफी समय पहले विजय नगर में नगर निगम की अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई के विरोध में भाजपा के एक बुजुर्ग एवं दिव्यांग कार्यकर्ता ने शहर विधायक से मिलकर शिकायत तक की थी। कार्यकर्ता ने नगर निगम की टीम पर मारपीट एवं अपमानित करने तथा मेयर पर इस मामले में सुनवाई न किए जाने का आरोप लगाया था।
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मेयर सुनीता दयाल अक्सर आक्रामक मिजाज में नजर आती हैं। ऐसा नहीं कि वह शहर हित में नहीं सोचती या काम नहीं कर रहीं बल्कि गाहे-बगाहे कोई न कोई विवाद उनके साथ जुड़ जाता है। महानगराध्यक्ष के साथ उनके टकराव को अच्छा नहीं माना जा सकता। चूंकि इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया है। विपक्ष ने भाजपा पर ताने मारने शुरू कर दिए हैं।
ये भी संभव है कि कार्यकारिणी चुनाव को अवैध घोषित कर दिए जाने से वह पार्षद भी मेयर के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर आएं, जो कल जीत का जश्न मनाने लगे थे। भाजपा के कुछ पूर्व पार्षद भी समय-समय पर मेयर के फैसलों पर सवाल उठाते रहे हैं। इस दौरान बयानबाजी होने पर मामला सुलझने की बजाय और बिगड़ने लगता है।
अच्छी बात है कि महानगराध्यक्ष मयंक गोयल ने ऐसी कोई बात नहीं कही, जिससे यह मामला आगे बढ़ता। फिलहाल भाजपा की अंतर्कलह को दूर करने के लिए संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को आगे आना चाहिए ताकि भविष्य में पुन: कोई नया विवाद खड़ा न हो पाए।



