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मिट्टी के लेप, से डाइट थेरेपी के जरिये इलाज की तकनीक आज भी कारगर

मिट्टी के लेप, जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, चुंबकीय चिकित्सा पद्धति, एनिमा, एक्यूपंचर/एक्यूप्रेशर, सूर्य चिकित्सा, व्रत, डाइट थेरेपी के जरिये इलाज की तकनीक आज भी कारगर है। इसे हीलिंग साइंस भी कहा जाता है। प्रकृति के पांचों मूल तत्वों का पालन करते हुए मनुष्य को रोगों से लडऩे के काबिल बनाती है प्राकृतिक चिकित्सा। तभी तो भारत ही नहीं, पूर्वी और पश्चिमी देशों के लोग वैकल्पिक चिकित्सा-पद्धतियों की ओर लौट रहे हैं। इस बारे में ज्यादा जानकारी दे रही हैं आशाश्र

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नेचुरोपैथी में इलाज का तरीका प्रकृति से प्रेरित होता है। प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों में पहुंचने वाले सभी लोग रोगी नहीं होते, बल्कि कुछ ऐसे प्रकृति प्रेमी भी हैं जो इस बात पर विश्वास करते हैं कि रोग को पनपने ही नहीं देना चाहिए, ताकि इलाज की नौबत ही न आए। यही वजह है कि देश के दक्षिणी राज्यों के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों में आने वाले रोगियों की तादाद बढ़ी है।

दरअसल, नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) रोगों से लडऩे की बेहद प्राचीन पद्धतियों में से एक है। इसमें औषधियों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किए बिना उपचार किया जाता है। बस रोगों के इलाज के लिए पंच तत्वों के साथ सही खान-पान और स्वस्थ जीवनशैली का प्रयोग किया जाता है। नेचुरोपैथी का मानना है कि मनुष्य के शरीर में सभी रोगों से लडऩे की क्षमता होती है। इस चिकित्सा के छह सिद्धांत हैं। ये सिद्धांत हैं- रोग को दूर करने के दौरान शरीर को हानि नहीं पहुंचे, रोग के साथ रोग के कारण का भी इलाज करना, रोग के इलाज से बेहतर है स्वस्थ जीवन जीने और रोग से बचने की क्षमता को विकसित करना, सभी को एक जैसी दवाई देने की जगह शरीर के अनुसार अलग-अलग चिकित्सा पद्धति अपनाना।

क्या हैं नेचुरोपैथी के फायदे : इस पद्धति में शरीर को बिना कोई कष्ट दिए रोगों का इलाज करने का प्रयास किया जाता है। रोग के इलाज के साथ रोगी को मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी प्रदान किया जाता है। नेचुरल तरीके से होने वाली इस चिकित्सा में साइड इफेक्ट का भी कोई खतरा नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से शरीर में दबे हुए रोग भी बाहर आकर जड़ से खत्म हो जाते हैं। दरअसल, नेचुरोपैथी का आयुर्वेद से करीबी रिश्ता है।

मड और फ्लावर थेरेपी दे नई जान : मड थेरेपी को मिट्टी चिकित्सा कहा जाता है। इसमें शरीर पर मिट्टी का लेप लगाकर उपचार किया जाता है। इसके अंतर्गत रोगों का उपचार व स्वास्थ्य लाभ का आधार है, रोगाणुओं से लडऩे की शरीर की स्वाभाविक शक्ति। जैसे भारत का आयुर्वेद और यूनान का नेचर क्योर। इस कुदरती चिकित्सा पद्धति में प्राकृतिक भोजन, विशेषकर ताजे फल और कच्ची व हल्की पकी सब्जियां विभिन्न बीमारियों के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चिकित्सा के इस तरीके में प्रकृति के साथ जीवनशैली का सामंजस्य स्थापित करना मुख्य रूप से सिखाया जाता है।

रोगी को जड़ी-बूटी आधारित दवाइयां दी जाती हैं। दवाइयों में रसायन के इस्तेमाल से बचा जाता है। ज्यादातर दवाइयां भी नेचुरोपैथी प्रैक्टिशनर खुद ही तैयार करते हैं। जहां तक फ्लावर थेरेपी की बात है तो फूल न केवल हमारे वातावरण को महकाते हैं, बल्कि इनके जरिए कई तरह की शारीरिक, मानसिक और सौंदर्य समस्याओं को हल किया जा सकता है। इस थेरेपी में गुलाब की पत्तियों, सूरजमुखी के फूलों, नारियल के फूल और तेल, जूही के पत्तों और चमेली के फूल-पत्तों, गुड़हल के फूलों का खूब इस्तेमाल होता है। रोग के इलाज के साथ इनसे सौंदर्य भी बढ़ाया जाता है।

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