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आजादी के 70 साल बाद भी देश में अल्पसंख्यकों के लिए कोई निश्चित नीति नहीं…

अल्पसंख्यकवाद मिथ्या है। आजादी के 70 साल बाद भी देश में अल्पसंख्यकों के लिए कोई निश्चित नीति नहीं है। सरकार हर साल उनके लिए विभिन्न योजनाओं के तहत 30,000 करोड़ रुपये खर्च करती है, लेकिन अल्पसंख्यकों की स्थिति जस की तस है। यह निष्कर्ष आरएसएस की पृष्ठभूमि के सामाजिक विश्लेषक दुर्गानंद झा के हैं। ‘भारत की अल्पसंख्यक नीति का अध्ययन और देश के मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण’ शीर्षक वाली दुर्गानंद की इस रिपोर्ट का विमोचन सोमवार शाम को होगा।

वह पटना में सेंटर फॉर पॉलिसी एनालिसिस चलाते हैं। झा की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अल्पसंख्यकों का पिछड़ापन अपने आप में एक मिथक है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संस्थान (एनएसएसओ) के आंकड़ों को उद्धृत करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के 11 राज्यों में अल्पसंख्यकों की प्रति व्यक्ति आय हिंदुओं से ज्यादा है। मुसलमानों के पिछड़ेपन की मूल वजह उनकी अधिकांश आबादी का उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और असम जैसे पिछड़े राज्यों में होना है।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि पूरे देश में चंद समुदायों को अल्पसंख्यक करार देने के बजाय राज्यवार उनकी जनसंख्या के मुताबिक ही अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए। आजादी के बाद जनसंख्या वृद्धि का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट ने पाया कि मुसलमानों में वृद्धि दर हिंदुओं और अन्य धर्मों के मुकाबले कहीं ज्यादा थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मुसलमानों में सुरक्षा का भाव पैदा कर उन्हें देश की मुख्यधारा में लाना होगा और इसके लिए पहला कदम खुद मुसलमानों को उठाना होगा। यदि वे हिंदुओं के मथुरा, काशी और अयोध्या जैसे तीर्थ उन्हें लौटा देते हैं तो इससे बड़ा सद्भाव का कदम दूसरा नहीं हो सकता। गौरतलब है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी पिछले महीने ऐसी ही भावना व्यक्त की थी।

‘लॉस्ट ऑपरचुनिटी’

अमर उजाला से बातचीत में दुर्गानंद झा मोदी सरकार के साढे़ चार साल के कार्यकाल को एक ‘खोया हुआ अवसर’ करार देते हैं। उनका मानना है कि यह सरकार भी पिछली सरकारों की ही नीतियां लागू करती रह गई और उसने अल्पसंख्यकों के लिए अलग नीति नहीं बनाई।

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