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खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम न्यायालय करेगा सुनवाई

की नाबालिग लड़कियों के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम न्यायालय में सोमवार को सुनवाई होगी सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ एक बार फिर मामले की सुनवाई करेगी दरअसल, पिछली सुनवाई में मुस्लिम समूह की ओर से पेश हुए एडवोकेट एएम सिंघवी ने बोला था कि बच्चियों के खतना को पॉक्सो एक्ट के तहत क्राइम कहना गलत है  क्राइम गलत नीयत से होता है

उन्होंने बोला था कि खतना धार्मिक रस्म है ऐसे में पुरुषों के खतना की तरह स्त्रियों के खतना का भी विरोध नहीं होना चाहिए इससे पहले न्यायालय ने बोला था कि ये दलील साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि की नाबालिग लड़कियों का खतना 10वीं सदी से होता आ रहा है इसलिए ये आवश्यक धार्मिक प्रथा का भाग है जिस पर न्यायालय द्वारा पड़ताल नहीं की जा सकती

सुप्रीम न्यायालय ने यह बात एक मुस्लिम समूह की ओर से पेश हुए एडवोकेट एएम सिंघवी की दलीलों का जवाब देते हुए कही थी सिंघवी ने अपनी दलील में बोला था कि यह एक पुरानी प्रथा है जो कि महत्वपूर्ण धार्मिक प्रथा का भाग है  इसलिए इसकी न्यायिक पड़ताल नहीं हो सकती सिंघवी ने न्यायालय से बोला था कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 25 26 के तहत संरक्षित है जो कि धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है न्यायालय ने इससे असहमति जतायी  बोला था कि यह तथ्य पर्याप्त नहीं कि यह प्रथा 10वीं सदी से प्रचलित हैइसलिए यह धार्मिक प्रथा का आवश्यक भाग है कोर्ट ने बोला था कि इस प्रथा को संवैधानिक नैतिकता की कसौटी से गुजरना होगा

संविधान के अनुच्छेद-21  15 का उल्लंघन
इससे पहले सुप्रीम न्यायालय ने बोला था कि नाबालिग लड़कियों का खतना परंपरा संविधान के अनुच्छेद-21  अनुच्छेद-15 का उल्लंघन है न्यायालय ने बोला था कि यह प्रक्रिया जीने  पर्सनल स्वतंत्रता, धर्म, नस्ल, जाति  लिंग के आधार पर भेदभाव करता है न्यायालय ने बोला था कि यह संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है क्योंकि इसमें बच्ची का खतना कर उसको आघात पहुंचाया जाता है केंद्र गवर्नमेंट की ओर से सुप्रीम न्यायालय को बताया गया था कि गवर्नमेंट याचिकाकर्ता की दलील का समर्थन करती है कि यह इंडियनदंड संहिता (IPC)  बाल यौन क्राइम सुरक्षा कानून (पोक्सो एक्ट) के तहत दंडनीय क्राइम है

क्या दाऊदी बोहरा मुस्लिम लड़कियां पालतू भेड़ बकरियां है?
इससे पहले सुप्रीम न्यायालय ने बोला था कि महिला सिर्फ पति की पसंदीदा बनने के लिए ऐसा क्यों करे? क्या वो पालतू भेड़ बकरियां है? उसकी भी अपनी पहचान है न्यायालय ने बोला था कि ये व्यवस्था भले ही धार्मिक हो, लेकिन पहली नज़र में स्त्रियों की गरिमा के विरूद्ध नज़र आती है न्यायालय ने ये भी बोला था कि सवाल ये है कि कोई भी महिला के जननांग को क्यों छुए? वैसे भी धार्मिक नियमों के पालन का अधिकार इस सीमा से बंधा है कि नियम ‘सामाजिक नैतिकता’  ‘व्यक्तिगत स्वास्थ्य’ को नुकसान पहुंचाने वाला न होयाचिकाकर्ता सुनीता तिवारी ने बोला था कि बोहरा मुस्लिम समुदाय इस व्यवस्था को धार्मिक नियम कहता है समुदाय का मानना है कि 7 वर्ष की लड़की का खतना कर दिया जाना चाहिए इससे वो शुद्ध हो जाती है ऐसी औरतें पति की भी पसंदीदा होती हैं याचिकाकर्ता के एडवोकेट ने बोला था कि खतना की प्रक्रिया को अप्रशिक्षित लोग अंजाम देते हैं कई मामलों में बच्ची का इतना ज्यादा खून बह जाता है कि वो गंभीर स्थिति में पहुंच जाती है

केंद्र ने याचिका का किया था सर्मथन
केंद्र गवर्नमेंट ने भी सुप्रीम न्यायालय में याचिका का समर्थन करते हुए बोला था कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है  वह इस पर रोक का समर्थन करता है इससे पहले केंद्र गवर्नमेंट ने बोला था कि इसके लिए दंड विधान में सात वर्ष तक कैद की सजा का प्रावधान भी है आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि इससे पहले सुप्रीम न्यायालय ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समाज में आम रिवाज के रूप में प्रचलित इस इस्लामी प्रक्रिया पर रोक लगाने वाली याचिका पर केरल  तेलंगाना सरकारों को भी नोटिस जारी किया थायाचिकाकर्ता  सुप्रीम न्यायालय में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने याचिका दायर कर इस प्रथा पर रोक लगाने की मांग की है

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