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इन राज्यों में महिलाओं की सत्ता में भागेदारी के आंकड़े चौंकाने वाले

भारत में शायद ही कोई राजनीतिक दल ऐसा होगा जो महिला हितों की बात न करता हो लेकिन वास्तव में ये राजनीतिक दल महिलाओं की सत्ता में भागेदारी को लेकर कितने गंभीर है ये बात सोचने वाली है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्य में विधानसभा में महिला प्रतिनिधियों की भागेदारी का प्रतिशत आपको चौंका देता है। किसी भी राज्य मे महिला प्रतिनिधित्व 14 प्रतिशत से अधिक नहीं है।

महिलाओं की भागेदारी में पिछड़ने का एक कारण राजनीतिक दलों की टिकट वितरण प्रणाली भी है। सभी दल इस बात का दावा करते हैं कि हम अधिक से अधिक महिलाओं को टिकट देने के पक्ष में है। कुछ दल तो इन्हें संगठन में 33 प्रतिशत आरक्षण की भी बात करते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्तमान में 15 प्रतिशत के आसपास ही टिकट महिलाओं को दिए जाते हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के कुल मंत्रियों की संख्या 75 है लेकिन इनमें महिला भागेदारी की बात की जाए तो यह मात्र 11 रह जाती है।

आजादी के पहले देश में पहली बार 1917 में महिलाओं को राजनीति में हक देने की मांग उठी थी। इसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मताधिकार मिला। हमारे देश में महिलाएं बेशक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, और विपक्ष की नेता जैसे पदों पर आसीन नजर आ जाती हैं लेकिन सही मायनों में इनकी राजनीतिक भागेदारी में अभी काफी कमी है।

इस स्थिति के बाद भी राजनीतिक दल महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने को लेकर गंभीर नजर नहीं आते हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह विधेयक कई बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन अभी तक पारित नहीं हुआ। इस विधेयक के कानून बनने के बाद लोकसभा की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इसी बात को लेकर कुछ दलों में चिंता है और वो इसके पीछे ये तर्क देते हैं कि अगर यह पास हो गया तो संसद में उच्च वर्ग की महिलाएं आ जाएंगी और इसका फायदा ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को नहीं मिलेगा।

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