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दलितों को भाजपा दे रही सियासी हिस्सेदारी, मायावती ने एक्ट को किया कमजोरः डॉ. निर्मल

फर्क इंडिया डिजिटल

लखनऊ. अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न निवारण अधिनियम को सबसे पहले मायावती ने कमजोर किया। मायावती ने ही अपनी सरकार में तत्काल केस दर्ज कर कार्रवाई किए जाने की अनिवार्यता पर रोक लगा दी थीं। ऐसे में उनका ये कहना कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति कर रही है, दलितों का अपमान है। मायावती दलितों की ठेकेदार बनना चाहती हैं। मायावती की वजह से ही एससी-एसटी एक्ट सबसे पहले कमजोर हुआ और इसकी नींव पड़ी।

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल

अनुसूचित जाति को संरक्षण देने वाले कानूनों पर पहला संस्थानिक हमला मायावती ने किया। उन्होंने सबसे पहले वर्ष 2007 में एससी-एसटी एक्ट को प्रभावहीन करते हुए यह आदेश करवाया कि यदि दलित महिला के साथ बलात्कार भी हो तो भी बिना मेडिकल रिपोर्ट के एफआईआर न दर्ज करवाई जाए।

मायावती ने एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने के साथ ही अनुसूचित जाति आयोग को भी दंत विहीन करने का काम किया। उन्होंने अनुसूचित जाति आयोग एक्ट में संशोधन न कर वर्ष 2007 में ही आयोग के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पदों पर अनुसूचित जाति के व्यक्ति के नियुक्ति की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। इतना ही नहीं, मायावती ने वर्ष 1998 में एक्ट का संशोधन कर अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष प्रमुख सचिव/सचिव/विभागाध्यक्ष स्तर के अधिकारियों के उपस्थित होने की अनिवार्यता को प्रतिबंधित कर दिया।

दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुसूचित जाति एक्ट को पुनः मूल रुप में बहाल कर उसे और सशक्त बनाने का कार्य किया है। इसके पूर्व वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के प्रयासों से अनुसूचित जातियों के लोगों की हत्या जैसे जघन्य मामले में पीड़ित परिवार को 8 लाख रुपए तक की सहायता की भी व्यवस्था की गई है। डॉ. निर्मल ने बताया कि अनुसूचित जाति वर्गों के लिए एससी-एसटी एक्ट सुरक्षा कवच है, जिसे समय समय पर मायावती ने कमजोर करने का काम किया।

समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हुए डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दलितों के हितैषी बनते हैं, उन्होंने अपने पांच साल की सरकार में किसी दलित को विधान परिषद सदस्य तक नहीं बनाया। यही नहीं, समाजवादी पार्टी ने कभी भी किसी दलित को राज्यसभा नहीं भेजा। यह पार्टी दलितों का क्या भला करेगी। यह तो दलितों के ठेके में आरक्षण को ही खत्म कर देती है और संसद में दलितों के संरक्षण का बिल फड़वा देती है।

दलितों की सियासत में हिस्सेदारी पर डाका कब तक डाला जाता रहेगा। उनका वोट लेकर, बदले में उन्हें झुनझुना कब तक थमाया जाएगा। यह सवाल अब दलित करेगा। भारतीय जनता पार्टी ने देश को दलित राष्ट्रपति और बेबी रानी मौर्य और सत्यदेव नारायण आर्य को राज्यपाल बनाकर दलितों को भी संवैधानिक पदों पर बैठाने का काम किया है, जबकि राहुल गांधी ने कहा था कि दलित नेतृत्व को प्रमोट करेंगे, लेकिन उन्होंने दलितों को उनके हालात पर छोड़ दिया, जबकि कांताकर्दम और राम सकल को अनुसूचित जाति के लोगों को राज्यसभा और विद्या सागर को भाजपा ने विधान परिषद भेजने का काम किया।

आजादी के 70 साल के इतिहास में पहली बार देश में दलितों के आर्थिक सशक्तिकरण का एजेंडा आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस एजेंडे से दलित रोजगार और स्वरोजगार की ओर आगे बढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा है कि दलित रोजगार को लेकर पलायन न करें, बल्कि वह अपने ही गांव शहर के आस-पास के इलाकों में पं. दीन दयाल स्वरोजगार योजना से जुड़कर रोजगार पैदा करें। दलितों को रोजगार से जोड़ने के लिए स्टैंडअप योजना के तहत 10 लाख से एक करोड़ तक तथा उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम की ओर से इन वर्गों को स्वरोजगार के लिए 20 हजार से 15 लाख की योजनाएं चलाई जा रही हैं।

दलित अब किसी एक पार्टी का नौकर बनकर रहने वाला नहीं है। वह खुद ही अपनी सियासत और अपना वजूद तय करेगा। अतिदलितों और अति पिछड़ों को धोखे में रखकर समाजवादी पार्टी और बसपा राजनीतिक रोटियां सेंकती रही हैं। सपा ने किसी दलित राजनीति को क्यों पैदा नहीं होने दिया। इसकी तरह बसपा ने भी किसी पिछड़ी जाति के नेता को उभारने का काम नहीं किया, जबकि ये दोनों ही पार्टियां एक दूसरे का मंच पर विरोध करने का नाटक करती हैं।

भारतीय जनता पार्टी का लोकसभा चुनाव में कोई विकल्प नहीं है। जनता ने 70 साल कांग्रेस को देकर देख लिया है। वह नहीं चाहती कि कांग्रेस इस देश की गरीब जनता को हाथ की कठपुतली की तरह नचाती रहे ये अब नहीं होगा।

फोटो-फाइल।।

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