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पावन ब्रज की धरती पर अवतरित भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली

भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली तथा लीलाभूमि पावन ब्रज की धरती के माहात्म्य अनंत हैं। यमुना नदी का तट, गोकुल, गोवर्धन पर्वत, नंदगांव, बरसाना सभी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के साक्षी हैं। कृष्ण भक्तों के लिए इस पावन भूमि का धार्मिक, पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व आज भी बना हुआ है। सावन और भादों मास में तो इस भूमि का महत्व स्वर्ग से भी बढ़कर हो जाता है।
मुक्ति कहै गोपाल सों, मेरी मुक्त बताय।
ब्रज-रज उडि़ माथे परे, मुक्ति मुक्त हो जाय।।

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ब्रज भूमि के माहात्म्य के बारे में कहा जाता है कि एक बार मुक्ति ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, केशव! मेरी मुक्ति का उपाय बतलाओ। प्रभु ने कहा, जब ब्रज रज तेरे सिर पर उड़कर पड़ जायें, तब तू अपने को मुक्त हुआ। यमुना नदी में जन्माष्टमी, यम द्वितीया तथा ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के स्नान तथा भगवद्दर्शन का विपुल माहात्म्य है।
ब्रजभूमि (मथुरा-वृंदावन) का अर्थ है, पूरा ब्रजमंडल, जिसका क्षेत्रफल 84 कोस माना जाता है। ब्रजमंडल को दो भागों में बांटा गया है। यमुना नदी के पूर्वी भाग में गोकुल, महावन, बलदेव आदि तथा पश्चिमी भाग में मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, कुसुम सरोवर, बरसाना और नंदगांव आदि स्थान आते हैं। ब्रजभूमि के तीर्थ मथुरा को इस भूमि का केंद्र माना जाता है। मथुरा के चारों दिशाओं में ब्रज के तीर्थ स्थित हैं। मथुरा का प्राचीन नाम मधुवन है। द्वापर युग में भगवान विष्णु ने यहां कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। इस स्थल के बारे में वेद, पुराण और धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न प्रकार की कथाएं प्रचलित हैं। यह स्थल एक ऐसी परंपरा और संस्कृति का वाहक है, जो भारतीय जनमानस में गहराई तक रची-बसी है। उत्तर भारत में सावन के महीने में झूले पर जब लोकगीत मल्हार और कजरी के गीत गूंजते हैं, तब सारा वातावरण श्रंृगार रस से सराबोर हो जाता है। इस लोकगीत का संबंध भी इसी भूमि से है। कजरी में श्रीकृष्ण की लीलाओं और क्रीड़ाओं का अनुपम वर्णन मिलता है। सूरदास और रसखान सहित हिंदी साहित्य के अनेक कवियों ने इस भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के प्रसंगों का अपनी रचनाओं में रोचक वर्णन किया है।
इस भूमि से जुड़े सभी स्थल कृष्ण भक्तों के लिए पवित्र हैं। सृष्टि के प्रारंभ में स्वयंभू मनु के पौत्र धु्रव को देवर्षि नारदजी ने मधुवन में जाकर उपदेश दिया था।
मधुवनं परम पवित्र स्थान मधुवन में श्री हरि नित्य सन्निहित रहते हैं। भक्त धु्रव ने यहां तपस्या की थी और उन्हें यहां भगवद््दर्शन प्राप्त हुआ था। ध्रुव के तपरूकाल में यह मधुवन था। बाद में मधु नामक राक्षस ने यहां मधुरा या मधुपुरी नामक नगर बसाया। यहां पर 25 घाट, 159 कुंड तथा 12 वन स्थित हैं।
वृंदावन – मथुरा से 17 किमी उत्तर की दिशा में वृंदावन स्थित है। यहां पर बांके बिहारी, मदन मोहन मंदिर तथा कालीघाट प्रसिद्ध हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का बचपन यहीं बीता था। यह स्थल मथुरा से 15 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यमुना नदी के किनारे बसे इस स्थल को भक्ति संस्कृति का केंद्र माना जाता है। यहां पर गोकुलनाथ, मदन मोहन और विट्ठलनाथ के प्राचीन मंदिर स्थित हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यहां का आकर्षण देखते ही बनता है। यहां के राजा ठाकुर मंदिर, गोपाल लालजी मंदिर तथा मोरवाला मंदिर प्रसिद्ध हैं।
महावन – मथुरा से 18 किमी तथा गोकुल से 2 किमी दूर स्थित है यह स्थल। यहां का चौरासी खंभा प्रसिद्ध है। यहां के श्यामलजी मंदिर, योगमाया मंदिर तथा महामलरायजी महल प्रमुख हैं।
गोवर्धन – ग्रंथों में कहा गया है कि गोवर्धन पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी उंगली पर उठाकर लगातार 7 दिनों तक इंद्र के कोप से लोगों को बचाया था। हिंदू धर्म के अनुयायी इस पर्वत की पूजा करते हैं। यह स्थल मथुरा से 24 किमी पश्चिम में स्थित है।
बरसाना – हिंदू देवता ब्रह्मा के नाम पर इस स्थल का नाम बरसाना पड़ा। यह राधाजी की जन्म स्थली माना जाता है। मथुरा से 45 कि मी पश्चिम में स्थित बरसाना में राधारानी मंदिर और लाडलीजी मंदिर दर्शनीय हैं। बरसाना की लठमार होली प्रसिद्ध है।
नंदगांव – बरसाना से लगभग 8 किमी दूर स्थित यह स्थल नंदजी का गांव माना जाता है। यहां पर नरसिंहा, गोपीनाथ, नृत्यगोपाल, गिरधारी, नंदनंदन और यशोदा नंदन मंदिर प्रमुख हैं।ब्रज के लोकगीत साक्षी, रासलीला, चारकूला तथा रसिया यहां के प्रसिद्ध लोकगीत हैं।

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