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रूबरू रोशनी की कहानी को किसी भी तरह की समीक्षा की जरुरत नहीं

रूबरू रोशनी की कहानी को किसी भी तरह की समीक्षा से अलग रखना चाहिए. ये एक ऐसी फिल्म है जिसे डॉक्यूमेंट्री मानने में भी हर्ज नहीं करना चाहिए. इसमें 1984 से 2009 तक के समय को तीन बड़ी घटनाओं के जरिए दिखाया गया है.

पिछले तीन दशक की उन तमाम कहानियों का जिक्र है, जिनका असर आज भी नजर आता है. इन कहानियों की तरह देश में अनगिनत अपराध हुए हैं, असंख्य लोगों को इसके खामियाजे भुगतने पड़े हैं. और यह बताने की जरूरत नहीं कि कई परिवार इनसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

सड़कों पर भीड़ की हिंसा वाले दौर में रूबरू रोशनी, आगाह करती है. मानवीय संवेदना के नुकसान को लेकर सचेत करती है. कई अपराध हम रौ में बहकर कर तो जाते हैं, लेकिन उसकी वजह से जिंदगी भर तमाम लोगों को जूझना पड़ता है. कई बार अपराध करने वाला भी उससे बच नहीं पाता. वह भी एक बोझ और पीड़ा से जिंदगी भर गुजरता है. रूबरू रोशनी, जघन्यतम अपराध और उसके बरक्स “क्षमा” को लेकर बुना गया है. आमतौर पर हकीकत में इस तरह की “क्षमापूर्ण” कहानियों को देखना बहुत ही दुर्लभ है.

रूबरू रोशनी की पहली कहानी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान पवित्र स्वर्ण मंदिर पर सेना की कार्रवाई और उसके बाद की हिंसा से निकलती है. घटना का असर पढ़े लिखे नौजवान रणजीत सिंह “कुकी” और उसके दोस्तों पर इस तरह पड़ता है कि वो दिल्ली में पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के दामाद और कांग्रेस सांसद ललित माकन की हत्या कर देता है. ललित के साथ उनकी पत्नी भी मारी जाती हैं. कुकी के इस अपराध का खामियाजा अवंतिका को कई साल तक भुगतना पड़ता है जो घटना के वक्त महज छह साल की थीं.

दूसरी कहानी 1995 में मध्यप्रदेश में धार्मिक घृणा में अपनी जान गंवाने वाली नन रानी मारिया की है. समंदर सिंह नाम के एक शख्स ने निर्दोष रानी की चाकुओं से हमला कर जान ले ली थी. रानी पर आरोप था कि वे धर्म परिवर्तन जैसे काम करा रही हैं. तीसरी कहानी मुंबई पर आतंकी हमलों में अपना पति खोने वाली विदेशी महिला कीया की है.

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