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शिवसेना ने इस संगठनों के नेताओं पर किया करारा हमला

शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए मेहनतकश लोग संगठनों के नेताओं पर करारा हमला कहा है शिवसेना ने बेस्ट के बहाने जॉर्ज फर्नांडिस के समय के याद करते हुए उन्हें भी इसमें घसीट दिया है इस दौरान शिवसेना ने महाराष्ट्र की फडणवीस गवर्नमेंट  केंद्र की मोदी गवर्नमेंट को भी निशाने पर लिया शिवसेना ने अपने मुखपत्र में बोला कि मेहनतकश लोग नेताओं को मजदूरों की चिंता नहीं होती है, उन्हें सिर्फ अपनी फिक्र होती है

शिवसेना ने अपने मुखपत्र में लिखा :

मजदूरों के पेट भूखे रहें तो भी चलेगा मगर मेहनतकश लोग नेताओं के पेट भर-भरकर फूलने चाहिए ऐसे नौटंकीबाज नेताओं में एक  नेता की संख्या बढ़ गई है बारिश आते ही सड़क पर स्थित गटरों के ‘मैनहोल’ से पहले साथी जॉर्ज फर्नांडिस बाहर निकलते थे ‘मैं आ गया हूं’ ऐसा कहते हुए भरी बरसात में म्यूनिसिपल मजदूरों की हड़ताल कराकर मुंबईकरों को परेशान करते थे हालांकि कब प्रारम्भ करना है  कब समाप्त करना है इसका खयाल जॉर्ज जैसे नेताओं को था भाई श्रीपाद अमृत डांगे मुंबई के मिल मजदूरों के सबसे बड़े नेता थेउन्होंने भी हड़ताल की, लेकिन टूटने तक नहीं ताना क्योंकि रोजगार मारकर  घर पर हड़ताल का हल चलाकर नेतृत्व करनेवालों की जमात तब नहीं थी

डॉ दत्ता सामंत ने मिल मजदूरों को हड़ताल की खाई में धकेला  वापस लौटने की सारी रस्सियों को काटकर मजदूरों का नुकसान किया ये हड़ताल आज भी जारी हैं, मगर मिल मेहनतकश लोग समाप्त हो गए मिल मालिकों को जो चाहिए था वही कामगार नेताओं ने किया  मुंबई का मराठीपन समाप्त कर दिया

आठ दिन पहले ‘बेस्ट’ की हड़ताल जिन्होंने की उन्हें फिर एक बार ‘बेस्ट’ मजदूरों का मिल मेहनतकश लोग करना था बचे-खुचे मराठी मजदूरों को नष्ट कर इसका पाप शिवसेना के सिर मढ़ने का कार्य पर्दे के पीछे कुछ लोग कर रहे थे इसके लिए कट्टर शिवसेना विरोधी एक हो गए  एक राव को आगे कर मजदूरों को रंक करने की वो साजिश थी ‘बेस्ट’ की आर्थिक अवस्था क्या है?  किसके कारण है? इस पर अब मुंह की डफली बजाई जा रही है मगर इस धराशायी होती व्यवस्था को संभालकर मजदूरों का वेतन मिले  उनके चूल्हे न बुझें इसका बंदोवस्त ‘बेस्ट’ के घाटे में रहने के बावजूद शिवसेना ने ही किया

मजदूरों से हकीकत कहो नेता पद की भूख मिटाने के लिए कहीं भी खुजलाते मत बैठो हड़ताल मत करो, ऐसा न्यायालय का कहना था  रास्ता निकालेंगे यही हमारी किरदार थीमराठी मजदूरों की थाली में दो निवाले अधिक आनेवाले होंगे तो हमें खुशी ही है लेकिन वो दो निवाला देते समय थाली के साथ पीढ़ा भी हमेशा के लिए साथ न जाए, इसे भी देखना हमारा कार्य था

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सहित अन्य कुछ मंडलियां हड़तालकर्मियों की मांगों में ऑयल डाल रही थीं मजदूरों शिवसेना के नाम से हल्ला करो ऐसा बोला जा रहा था ये सब करने की बजाय राज्य गवर्नमेंट ने यदि हजार-पांच सौ करोड़ रुपए ‘बेस्ट’ को आधार देने के लिए दिया होता तो मजदूरों की ढेर सारी मांगें मंजूर हो गई होती मुंबई से सालाना लाख-दो लाख करोड़ दिल्ली की तिजोरी में जाते ही हैं न? मुंबई को इस तरह खसोटते ही हो न फिर ऐसे मौके पर 100-500 हजार करोड़ रुपए भले ही अनुदान के रूप में देने में असहमति क्या थी? मजदूरों का सात-आठ हजार की वेतन वृद्धि होने की गप हांककर नेताओं ने हड़ताल पीछे ले लिया इसमें हकीकत क्या है  झूठ क्या है, यह अगले वेतन के दिन ही समझ में आ जाएगा इसे हम आज ही कह रहे हैं

हड़ताल में शामिल एक भी मेहनतकश लोग की जॉब नहीं जाएगी, ऐसा हमारा वचन था  आज भी है मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है  मुंबई का श्रमिक  मेहनतकश लोगसम्मानपूर्वक जीना चाहिए इसी के लिए ही शिवसेना का जन्म हुआ ऐसे में मराठी माणुस के मन में जहर घोटने का कितना ही इस्तेमाल क्यों न हो वो खोखला ही साबित होगासरकारी तिजोरी से मोदी की ‘बुलेट ट्रेन’ के लिए जिस तत्परता से 500 करोड़ देते हो वही आस्था बेस्ट मजदूरों के बारे में क्यों दिखाई नहीं गई? घाटे में तो महाराष्ट्र  दिल्ली का शासन भी चलता है मगर वहां ‘अच्छे दिन’ का आभास पैदा करने के लिए विज्ञापनबाजी पर हजारों करोड़ रुपए फूंके जाते हैं मगर ‘बेस्ट’ के हड़ताल कर्मियों की मांगों को पूरा करने के लिए हाथ पीछे खींच लिया जाता है

‘बेस्ट’ जैसे उपक्रम पहले फायदे में थे उसकी बहुत सारी वजहें हैं सिर्फ रेलवे  बेस्ट ही यातायात के दो साधन उपलब्ध थे तथा बेस्ट बसों के लिए लंबी-लंबी कतारें लगा करती थीं आज हर घर में दो गाड़ियां हैं ओला, उबेर, मेट्रो, मोनो रेल जैसे नए मार्ग निर्माण हुए उसका भी खामियाजा ‘बेस्ट’ को भुगतना पड़ रहा है अब इस घाटे में चलनेवाले उद्योग का केंद्र गवर्नमेंट की नीतियों की तरह निजीकरण कर इस विषय को समाप्त करना है कि उसे बचाकर मराठी लोगों की नौकरियां बचानी हैं, इसका जवाब मुफ्त की ‘राव’गीरी करनेवाले तथा उस राव का पर्दे के पीछे से सूत्र संचालन करनेवाले दें जनता रंक  खाक हो गई तब भी चलेगा मगर नेताओं की ‘राव’गीरी चलती रहनी चाहिए हम इस विचार के नहीं थे जिन्हें शोर मचाना है, वे शोर मचाते रहें

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