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हिंसा को एक वर्ष हुआ पूरा आज भी इस समुदाय में मौजूद है भय 

जहां पूरी संसार में लोग नए वर्ष पर जश्न मनाते हैं, घूमने जाते हैं. वहीं अनुसूचित जाति के लोग भीमा कोरेगांव स्थित पंडाल में आते हैं. ये लोग हर वर्ष 31 दिसंबर को यहां एकत्रित होतेे हैं. भारी ठंड में अंबेडकर के गाने गाते हैं. लेकिन बीते वर्ष जो हुआ उसका भय आज भी इस समुदाय में मौजूद है. बीते वर्ष हुई हिंसा को आज (एक जनवरी 2019 को) एक वर्ष पूरा हो गया है.

खास बातें

  • भीमा कोरेगांव हिंसा को एक वर्ष पूरा हुआ.
  • भारी संख्या में पुलिस बल तैनात.
  • लोगों में अब भी डर.
  • बीते वर्ष 1 जनवरी को हुई थी हिंसा.
  • अनुसूचित जाति  मराठा समुदाय के बीच हुई थी हिंसा.

वर्ष के पहले दिन हुई इस हिंसा में एक आदमी की मौत हो गई थी  पूरे महाराष्ट्र में भारी प्रदर्शन हुए. जिसके बाद पुणे पुलिस ने अगस्त माह में हिंसा को लेकर नक्सलियों को समर्थन देने के आरोप में पांच वामपंथी विचारकों को अरैस्ट किया. इस हिंसा की आवाज पूरे वर्ष राष्ट्र की पॉलिटिक्स में भी गूंजी.

क्यों एकत्रित होते हैं लोग?

हर वर्ष एक जनवरी को अनुसूचित जाति के लोग यहां जश्न मनाने के लिए एकत्रित होते हैं. ये जश्न नए वर्ष का नहीं बल्कि 1 जनवरी, 1818 को हुए युद्ध में जीत को लेकर मनाया जाता है. 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को हरा दिया था. पेशवा की सेना का नेतृत्व बाजीराव द्वितीय कर रहे थे. इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत को अनुसूचित जाति के लोग अपनी जीत मानते हैं. उनका कहना है कि इस लड़ाई में अनुसूचित जाति के साथ अत्याचार करने वाले पेशवा की पराजय हुई थी.

विजय स्तंभ के सामने सम्मान

हर वर्ष 1 जनवरी के अनुसूचित जाति के लोग विजय स्तंभ के सामने सम्मान प्रकट करते हैं. ये स्तंभ ईसट इंडिया कंपनी ने तीसरे एंगलो-मराठा युद्ध में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था. इस स्तंभ पर उन लोगों के नाम लिखे हैं जो 1818 की लड़ाई में शामिल हुए थे.

क्या था हिंसा का कारण?

साल 2018 में 1818 को हुए युद्ध को 200 वर्ष पूरे हुए थे. इस मौके पर अनुसूचित जाति के लोग युद्ध जीतने वाली महार रेजिमेंट को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे. इसी दौरान अनुसूचित जाति  मराठा समुदाय के लोगों के बीच हिंसा भड़क उठी. इस हिंसा में एक आदमी की मौत भी हुई.

क्यों है भय का माहौल?

यहां दुकान लगाने वाले 35 वर्षीय संतोष दावने का कहना है कि नए वर्ष का पहला दिन शांति भरा होगा. युद्ध में शामिल लोगों को सम्मान देने के लिए संतोष यहां बीते 12 वर्ष से आ रेह हैं. उनका कहना है कि मैं हर वर्ष यहां स्टॉल लगाता हूं लेकिन इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल कभी नहीं देखा. लोगों में थोड़ा भय है, जो पहले कभी देखने को नहीं मिला.

रेखा गायकवाड़ की आटा चक्की की दुकान बीते वर्ष हुई हिंसा में बर्बाद हो गई थी. उनका कहना है कि पहले कभी गांवों को इतना विभाजित होते नहीं देखा जितना इस बार देखा गया. दो अन्य लोग प्रणे  बादरुक का कहना है कि इस वर्ष किसी तरह की कठिनाई की संभावना नहीं है. सोशल मीडिया पर भी तनाव उतना नहीं है क्योंकि सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जा रहा है.

रेखा का कहना है कि उनकी आटा चक्की के बर्बाद होने के कई महीनों बाद तक उन्हें घाटे का सामना करना पड़ा. दो बच्चों की मां रेखा कहती हैं कि उन्हें अपनी चक्की का कार्य कहीं प्रारम्भ करना पड़ा. गांव में बाकी मकान मालिक भी अपने अनुसूचित जाति के किरायेदारों से घर खाली करवाने लगे. गांव के लोगों ने रेखा की चक्की पर आना बंद कर दिया. दो वक्त की रोटी कमाना भी उनके लिए किसी प्रयत्न से कम नहीं था. रेखा इस बार नए वर्ष का जश्न अच्छे से मनाना चाहती हैं. उन्होंने अपनी चक्की के बाहर बाबा साहेब अंबेडकर की फोटोज़लगाई हैं. ये कहानी सिर्फ रेखा की ही नहीं है बल्कि  भी कई लोगों की है.

पुलिस ने कबीर कला मंच, समता कला मंच के कलाकारों  अनुसूचित समुदाय के कार्यकर्ताओं को 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव न आने के आदेश दिए हैं. यहां करीब 5 हजार पुलिकर्मी तैनात हैं. पुलिस की कई गाड़ियां मौजूद हैं  ड्रोन कैमरा से पूरा निरीक्षण किया जा रहा है. पुलिस का मानना है कि 4-5 लाख लोग मंगलवार को यहां आएंगे. पहले ही 1200 से ज्यादा लोगों के विरूद्ध प्रिवेन्टिव एक्शन लिए जा चुके हैं.  लोगों की सुरक्षा के लिए पुख्ता बंदोवस्त किए गए हैं.

पांच वामपंथी विचारक गिरफ्तार

इस हिंसा में माओवादी कनेक्शन सामने आया था. जिसके बाद पुणे पुलिस ने देशभर में कई नक्सल समर्थकों के आवास पर छापे मारे  माओवादी समर्थक वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, बरनोन गोंजालविस  गौतम नवलखा को अरैस्ट कर लिया. इन लोगों पर आरोप है कि इन्होंने एल्गार परिषद सम्मेलन में सहायता की थी जिसके बाद हिंसा फैली. इनके मामले में फिल्हाल सुप्रीम न्यायालय में सुनवाई चल रही है.

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