नीट पीजी काउंसलिंग 4 सप्ताह के लिए स्थगित

स्टार एक्सप्रेस डिजिटल 

डेस्क. NEET PG Counselling 2021: केंद्र ने उच्चतम न्यायालय को गुरुवार को बताया कि वह नीट पीजी में आरक्षण के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) श्रेणी निर्धारित करने के लिए तय की गयी आठ लाख रुपये की सालाना आय की सीमा पर फिर से गौर करेगा। केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया कि वह ईडब्ल्यूएस श्रेणी निर्धारित करने के लिए मानदंड तय करने के वास्ते समिति गठित करेगा और समिति को यह काम करने के लिए चार हफ्तों का वक्त चाहिए। केंद्र ने कहा कि समिति के ईडब्ल्यूएस श्रेणी निर्धारित करने के लिए मानदंड पर फैसला लेने तक नीट की काउंसिलिंग चार हफ्तों के लिए स्थगित की जाती है।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी निर्धारित करने के लिए मानदंड तय करने के वास्ते एक समिति गठित की जाएगी और समिति को यह काम करने के लिए चार हफ्तों का वक्त लगेगा। मेहता ने कहा कि अदालत में पहले दिए आश्वासन के अनुसार नीट (पीजी) काउंसिलिंग और चार हफ्तों के लिए स्थगित की जाती है।

 

उच्चतम न्यायालय उन कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है जिसमें केंद्र और मेडिकल काउंसिलिंग समिति (एमसीसी) की 29 जुलाई की अधिसूचना को चुनौती दी गई है। इस अधिसूचना के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 फीसदी और ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण मेडिकल पाठ्यक्रमों में नामांकन के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में दिया गया है।

 

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण बहुत सक्षम और प्रगतिशील प्रकार का आरक्षण है और सभी राज्यों को केंद्र के इस प्रयास में उसका समर्थन करना चाहिए। पीठ ने कहा कि एकमात्र सवाल यह है कि श्रेणी का निर्धारण वैज्ञानिक तरीके से किया जाना चाहिए और वह इसकी सराहना करती है कि केंद्र ने पहले से तय मानदंड पर फिर से गौर करने का फैसला किया है।

याचिकाकर्ताओं (छात्रों) की पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि चूंकि काफी समय बीत गया है तो केंद्र को अगले अकादमिक वर्ष के लिए ईडब्ल्यूएस आरक्षण के क्रियान्वयन को वापस लेना चाहिए और मौजूदा वर्ष की काउंसिलिंग को शुरू करना चाहिए।

पीठ ने दातार की दलीलों पर सहमति जतायी और मेहता से पूछा कि क्या वह अगले आकदमिक वर्ष तक संवैधानिक संशोधन के क्रियान्वयन को वापस ले सकते हैं और मौजूदा अकादमिक वर्ष के लिए काउंसिलिंग शुरू कर सकते हैं। इस पर मेहता ने कहा कि सरकार ने मौजूदा अकादमिक वर्ष के लिए 103वें संवैधानिक संशोधन को लागू करने का फैसला लिया और इसे वापस लेना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर श्रेणी निर्धारण की प्रक्रिया चार हफ्तों से पहले हो जाती है तो वह अदालत को सूचित करेगा।

पीठ ने दातार से कहा कि चार हफ्तों का समय अनुचित नहीं है और वह नहीं चाहती है कि सरकार इसे जल्दबाजी में करें वरना मानदंड अवैज्ञानिक और बेतरतीब ढंग से तय किए जाएंगे।

ओबीसी उम्मीदवारों की ओर से पेश वकील शशांक रत्नू ने अनुरोध किया कि ओबीसी छात्रों के आरक्षण की अर्जी खारिज नहीं की जानी चाहिए क्योंकि केंद्र ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लिए मानदंड पर फिर से गौर करने की योजना बना रहा है। इस पर पीठ ने कहा कि उसने ओबीसी छात्रों के बारे में कुछ नहीं कहा है और वह याचिका का निस्तारण नहीं कर रहा है।

 

इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने 21 अक्टूबर को केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या वह नीट या मेडिकल कोर्सेज में एडमिशन के लिए ईडब्ल्यूएस के निर्धारण के लिए आठ लाख रुपये वार्षिक आय की सीमा तय करने पर पुनर्विचार करेगी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वह नीति निर्धारण के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर रही है बल्कि केवल यह निर्धारित करने का प्रयास कर रही है कि क्या संवैधानिक मूल्यों का पालन किया गया है अथवा नहीं।

न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्न की पीठ इस बात से खफा थी कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने हलफनामा दायर नहीं किया और कहा कि केंद्र एक हफ्ते के अंदर सवालों के जवाब दे। पीठ ने कहा था, ”हमें बताइए कि क्या आप मानक पर पुनर्विचार करना चाहते हैं अथवा नहीं। अगर आप चाहते हैं कि हम अपना काम करें तो हम इसके लिए तैयार हैं। हम प्रश्न तैयार कर रहे हैं जिसका जवाब आपको देना है। हम सरकार की अधिसूचना पर रोक लगा सकते हैं जिसमें ईडब्ल्यूएस निर्धारित करने के लिए आठ लाख रुपये का मानक तय किया गया है और आप हलफनामा दायर करते रहिएगा।”

 

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