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यहाँ CM के लिए अटकलें हुई तेज

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी हाई कमान को गवर्नमेंट बना लेने का पूरा भरोसा है. हालांकि अभी सभी सीटों का चुनाव परिणाम नहीं आ सका है, लेकिन राज्य में अगले CM के लिए अटकलें तेज हो गई हैं. राजस्थान में CM पद के लिए प्रदेश कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सचिन पायलट  पूर्व मु्रख्यमंत्री अशोक गहलोत में कड़ा मुकबला होता दिखाई दे रहा है. अशोक गहलोत भले ही सार्वजनिक तौर पर खुद को CM पद के लिए महत्वाकांक्षी न बताएं, लेकिन अंदरखाने में उनके समर्थक लगातार इस पद के लिए सक्रिय है. गहलोत ने राज्य विधानसभा चुनाव में अपनी कुछ बातों को मनवाने के लिए यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी का सहारा भी लिया था.

गहलोत क्यों बने सीएम?

गहलोत के करीबी जयपुर के सूत्र का कहना है कि गहलोत लोकसभा चुनाव तक CM बनने के पक्ष में हैं. इसके पीछे गहलोत के समर्थकों का तर्क 2019 का लोकसभा चुनाव है. बताते हैं अगले कुछ महीने में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के दौरान राजस्थान में एक बार फिर बीजेपी  कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगेगी. गहलोत समर्थकों का दावा है कि इस लड़ाई को सचिन पायलट के भरोसे नहीं जीता जा सकता. राजस्थान में बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी सीटों पर जीत हासिल कर ली थी. गहलोत के समर्थकों का कहना है कि यदि सबकुछ अच्छा रहा  विधानसभा चुनाव की तर्ज पर कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव का चौसर बिछाया को 20 से अधिक सीटें कांग्रेस पार्टी के पक्ष में आना तय है.
सचिन पायलट युवा हैं. केन्द्र गवर्नमेंट में मंत्री रहे हैं. राजस्थान के गुर्जर समाज में अच्छी पकड़ रखते हैं. कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से अच्छी निभती है. विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें अपने पिता  पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व राजेश पालट की छाया में ही देखा जाता था. वह राजेश पायलट की परंपरागत सीट से लोकसभा का चुनाव लड़कर भी जीते थे. एक तरह से बोला जाय तो सचिन पायलट दौसा एरिया तक सिमटे हुए नेता थे, लेकिन पिछले डेढ़ वर्षों में उन्होंने राजस्थान की फिजां बदल डाली. पूरे राजस्थान का न केवल तूफानी दौरा किया, बल्कि हर समाज, वर्ग में पकड़ बनाई. वसुंधरा गवर्नमेंट के विरूद्ध लोगों की नाराजगी की नब्ज टटोली. एरिया से बाहर निकले  पूरे राजस्थान में फैल गए. राजस्थान में हुए लोकसभा  विधानसभा के उपचुनाव में पायलट ने अपनी मेहनत का एहसास भी कराया.
राजस्थान के रेगिस्तान से लेकर मैदान तक जब सचिन पायलट घर-घर की घंटी बजाकर कांग्रेस पार्टी की उम्मीद जगा रहे थे, तब पॉलिटिक्स के चतुर खिलाड़ी मौन थे. माना जा रहा है कि गहलोत उस समय सचिन पायलट की कूवत आंक रहे थे. गहलोत को भरोसा था कि सचिन पायलट के लिए राजस्थान में कांग्रेस पार्टी की जड़ों को हरा करना सरल नहीं होगा.राजस्थान की पॉलिटिक्स के जानकार बताते हैं कि लेकिन सचिन इस इंतहान को सरलता से पास कर लिया. अपने मुश्किल  स्मार्ट मूव से पायलट ने राहुल गांधी का भी विश्वास जीत लिया. दूसरी तरफ गुजरात के प्रभारी के तौर पर गहलोत ने भी राहुल गांधी का विश्वास हासिल करने में सफलता पा ली. इसके बाद गहलोत सचिन के साथ तालमेल बनाने में जुट गए.
सचिन पायलट के सहयोगियों का कहना है कि राजस्थान में टिकट वितरण सही नहीं हुआ था. कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी भी टिकट वितरण को लेकर बीच में नाराज हो गए थे.बताते हैं यह गहलोत इफेक्ट था. राजस्थान में सभी बड़े नेताओं को मैदान में उतारना  उनकी उनके एरिया में जिम्मेदारी तय कराने की सलाह भी गहलोत इफेक्ट थी. सचिन पायलट के करीबियों के अनुसार राजस्थान में सत्ता बदलाव तय थी. वसुंधरा राजे गवर्नमेंट के खिलाफ जबरदस्त विरोधी लहर थी  इसे कांग्रेस पार्टी ने भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
सूत्रों का कहना है कि यदि अशोक गहलोत इफेक्ट कुछ मामलों में प्रभावी न हुआ होता तो बीजेपी को बहुत ज्यादा कम सीटेंमिलती. अशोक गहलोत के समर्थक इसे बिल्कुल उल्टा करके देखते हैं. उनका मानना है कि गहलोत का पूरे राज्य में हर जाति, वर्ग, संप्रदाय में असर है. अनुभव है. पॉलिटिक्स में निपुण हैं. यदि गहलोत राजस्थान में समय  बड़े पैमाने पर सहयोग न देते तो कांग्रेस पार्टी का बीजेपी को हरा पाना सरल नहीं था.

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