राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, मऊ में राजभाषा कार्यशाला एवं काव्य गोष्ठी का भव्य आयोजन

विभिन्न जनपदों से आए कवियों ने काव्य पाठ से बाँधा समां

मऊ । आई.सी.ए.आर.-राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, कुशमौर, मऊ में सोमवार को राजभाषा कार्यशाला एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन एक भव्य साहित्यिक पर्व के रूप में हुआ। कार्यक्रम निदेशक डॉ. आलोक कुमार श्रीवास्तव के मार्गदर्शन तथा प्रशासनिक अधिकारी श्री रजनीश मीना के संचालन में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी अधिकारी डॉ. हर्षवर्धन सिंह के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने वैज्ञानिक संचार में हिंदी की भूमिका, उसकी महत्ता और प्रचार-प्रसार पर अपने विचार रखे। उनके अनुसार, “हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम भी है।”

संस्थान के निदेशक डॉ. श्रीवास्तव ने इस मौके पर आए कवियों एवं कवयित्रियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य और विज्ञान का संगम समाज को नई दिशा देता है। उन्होंने बताया कि ब्यूरो में प्रतिवर्ष इस प्रकार के आयोजन होते हैं, किंतु इस बार विभिन्न जनपदों के कवियों की सहभागिता से यह गोष्ठी विशेष बन गई।

गोष्ठी का शुभारंभ देवरिया की शिक्षिका एवं कवयित्री गुनगुन गुप्ता ‘गुंजन’ की सरस्वती वंदना से हुआ। उन्होंने दांपत्य जीवन की मधुरता और सामाजिक गंदगी पर अपनी भावपूर्ण रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके बाद प्रतापगढ़ से आईं अंतरराष्ट्रीय कवयित्री प्रीति पांडेय ने नारी की आस्था, प्रेम की पवित्रता और सामाजिक जिम्मेदारियों पर आधारित अपनी कविताओं से वातावरण को गहन संवेदनशीलता से भर दिया।

स्थानीय कवि पंकज प्रखर ने वीर रस की ओजस्वी कविताओं से सभा में देशभक्ति का ज्वार जगा दिया। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की याद ताजा करा दी।

गोष्ठी का सबसे आकर्षक और मनोरंजक पक्ष रहा वाराणसी से आए प्रख्यात हास्य-व्यंग्य कवि डॉ. नागेश शांडिल्य का काव्य पाठ। उन्होंने हास्य के माध्यम से जीवन की सच्चाइयों को प्रस्तुत किया। उनकी व्यंग्य रचनाओं पर पूरा सभागार ठहाकों से गूंज उठा। खास बात यह रही कि डॉ. शांडिल्य ने कार्यक्रम का संचालन भी अपने चुटीले अंदाज से किया, जिससे पूरे आयोजन में ऊर्जा और रोचकता बनी रही।

कार्यक्रम में ब्यूरो के वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों के साथ-साथ बीज अनुसंधान केंद्र से आए अधिकारी भी मौजूद रहे। समापन अवसर पर सुश्री शिवानी थापा ने सभी आमंत्रित कवियों और श्रोताओं के प्रति आभार ज्ञापित किया।

यह आयोजन केवल साहित्यिक रसास्वादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हिंदी भाषा की समृद्धि और उसकी सांस्कृतिक महत्ता को भी रेखांकित करता रहा। विज्ञान और साहित्य के इस अद्भुत संगम ने यह संदेश दिया कि भाषा के बिना ज्ञान अधूरा है और साहित्य समाज को जोड़ने का सबसे मजबूत सेतु है।

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