ईरान संघर्ष से भारत ने सबक लिया; चीन की तर्ज पर कर रहा ये तैयारी

Crude Oil Reserve: अमेरिका-ईरान विवाद के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ा। महंगी दरों पर तेल आयात करने से देश का आयात बिल और चालू खाता घाटा (current account deficit) बढ़ गया, साथ ही रुपये पर भी दबाव पड़ा। हालांकि, चीन ने इस संकट का मुकाबला कहीं बेहतर ढंग से किया। नतीजतन, अब भारत भी चीन की तरह ही कच्चे तेल का बड़ा भंडार बनाने पर विचार कर रहा है।

द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार घरेलू तेल कंपनियों को बड़े तेल भंडार बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करने पर विचार कर रही है ताकि सप्लाई में संभावित रुकावटों से निपटा जा सके। ईरान विवाद के दौरान, चीन ने पहले ही भारी मात्रा में कच्चे तेल का स्टॉक जमा कर लिया था। नतीजतन, जब कीमतें बढ़ीं, तो चीन ने नई खरीद कम कर दी और अपने मौजूदा भंडार का इस्तेमाल किया, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था तेल की बढ़ती कीमतों के पूरे असर से बच गई।

फिलहाल भारतीय तेल रिफाइनरियां लगभग 15 दिनों के कामकाज के लिए पर्याप्त कच्चा तेल भंडार रखती हैं। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि सरकार इस अवधि को बढ़ाने पर विचार कर रही है। देश में कच्चे तेल की दैनिक खपत लगभग 50 लाख (5 मिलियन) बैरल है। 30 दिनों की मांग को पूरा करने में सक्षम भंडार बनाने के लिए, रिफाइनरियों को लगभग 15 करोड़ (150 मिलियन) बैरल कच्चा तेल जमा करना होगा।

विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, तेल की मौजूदा कीमतों और डॉलर-रुपये विनिमय दर के आधार पर रिफाइनरियों को अपने कच्चे तेल के भंडार को दोगुना करने के लिए लगभग ₹60,000 करोड़ का अतिरिक्त निवेश करना पड़ सकता है। इसके अलावा, नए स्टोरेज टैंक बनाने के लिए भी हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होने की उम्मीद है। पूरे बुनियादी ढांचे को तैयार करने में कई साल लग सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, बड़े पैमाने पर स्टॉक बनाने में शामिल भारी पूंजी और रखरखाव लागत के कारण कुछ रिफाइनरी कंपनियों की ओर से इस प्रस्ताव का विरोध हो सकता है। हालांकि, उद्योग के कुछ विशेषज्ञों का मानना ​​है कि सरकार को रिफाइनरियों को बंदरगाहों के पास स्टोरेज सुविधाएं बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन भंडारों का व्यापार करना आसान हो जाएगा।

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ सिंगापुर का उदाहरण देते हैं। अपने विशाल तेल भंडार और आधुनिक स्टोरेज सुविधाओं की बदौलत, सिंगापुर आज एशिया में तेल व्यापार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में पहचाना जाता है। भारत में इसी तरह का सिस्टम बनाने से देश की एनर्जी सिक्योरिटी को मज़बूत करने में मदद मिल सकती है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के लगभग बंद होने की घटना ने भारतीय नीति-निर्माताओं की एक पुरानी सोच को गलत साबित कर दिया है। पहले यह माना जाता था कि फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के पास होने के कारण भारत को बड़े रणनीतिक तेल भंडार (strategic oil reserves) की ज़रूरत नहीं है। हालाँकि, हाल की घटनाओं ने एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बड़े भंडार बनाए रखने के महत्व को उजागर किया है।

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US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2025 के अंत तक भारत के पास केवल 21 मिलियन बैरल का रणनीतिक कच्चा तेल भंडार था। इसके विपरीत, चीन के पास 1,397 मिलियन बैरल, US के पास 413 मिलियन बैरल और जापान के पास 263 मिलियन बैरल भंडार था।

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