छिन गया चुनाव चिह्न, BJP ने मारी बाजी… क्या अब दीदी की शरण में लौटेंगे TMC के ‘गद्दार’ नेता?

TMC News Today: पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद बिखरी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को फिर से एकजुट करने की कोशिशें तेज होती नजर आ रही हैं। पार्टी से अलग हुए नेताओं के रुख में बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। चोपड़ा से विधायक हमीदुल रहमान ने ममता बनर्जी को अपना नेता बताते हुए स्पष्ट किया है कि वह हमेशा से उनके समर्थक रहे हैं। उनके इस बयान के बाद बंगाल की राजनीति में सवाल उठने लगा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस के बागी नेता एक बार फिर ममता बनर्जी के साथ लौटेंगे? हालांकि, अभी तक पार्टी की ओर से बड़े पैमाने पर नेताओं की वापसी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
हमीदुल रहमान ने ममता बनर्जी को बताया अपना नेता
रिपोर्ट के अनुसार, चोपड़ा विधायक हमीदुल रहमान ने मंगलवार को पार्टी नेताओं के साथ बैठक की। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण वह पहले पार्टी की गतिविधियों से दूर बताए जा रहे थे। इस बैठक के बाद उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति अपनी राजनीतिक निष्ठा जाहिर की। रहमान ने कहा, “मैं हमेशा ममता बनर्जी का फॉलोअर रहा हूं। मैं तृणमूल के चुनाव चिह्न पर चुना गया था। मैं ममता को पार्टी का नेता मानता हूं। वह पार्टी की हाई कमान हैं।”
उनके इस बयान को बागी खेमे से दूरी बनाने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से इस बयान पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
क्या बागी गुट में जाने की अटकलों पर लगा विराम?
हमीदुल रहमान को लेकर पहले ऐसी चर्चाएं थीं कि उन्होंने ममता बनर्जी का साथ छोड़कर ऋताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट का रुख कर लिया है। अब उनके ताजा बयान ने इन अटकलों को फिर चर्चा में ला दिया है।
रहमान ने बागी गुट से जुड़ने के सवाल पर कहा था कि उन्होंने संसदीय हितों और विपक्ष के लिए कार्यालय परिसर से जुड़े दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने को लेकर सहमति जताई थी। उस समय उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि ऋताब्रत बाबू अलग राजनीतिक दल बना लेंगे या स्वतंत्र रूप से फैसले लेने लगेंगे।
इस बयान से संकेत मिलता है कि बागी खेमे के साथ उनके जुड़ाव को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। हालांकि, उनके ताजा रुख से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि उन्होंने औपचारिक रूप से गुट छोड़ दिया है।
कासिम सिद्दीकी और रतिन घोष भी दे चुके हैं संकेत
तृणमूल कांग्रेस में टूट के बीच हमीदुल रहमान का बयान अकेला घटनाक्रम नहीं है। इससे पहले कासिम सिद्दीकी ने औपचारिक रूप से ऋताब्रत गुट छोड़ने का ऐलान किया था। वहीं, कुछ दिन पहले रतिन घोष भी ममता बनर्जी को अपना नेता बता चुके हैं।
इन घटनाक्रमों के बाद पार्टी के भीतर संभावित वापसी और राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में पार्षदों से लेकर सांसद स्तर तक नेताओं के अलग होने की खबरें सामने आई थीं। ऐसे में कुछ नेताओं के बदले रुख को पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है।
हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि आने वाले दिनों में कितने नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट में लौटेंगे। किसी भी नेता की वापसी की पुष्टि के लिए आधिकारिक घोषणा जरूरी होगी।
ममता बनर्जी ने बागियों को दिया था 15 दिन का अल्टीमेटम
अक्टूबर के पहले सप्ताह में ममता बनर्जी ने बागी विधायकों और सांसदों को पार्टी में लौटने के लिए 15 दिनों का समय दिया था। दिनाजपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा था कि तृणमूल कांग्रेस की मदद से चुनाव जीतने वाले कई विधायक और सांसद पार्टी छोड़कर गद्दार बन गए हैं।
ममता बनर्जी ने कहा था कि पार्टी छोड़कर गए नेताओं के लिए वापसी का रास्ता सीमित समय तक ही खुला रहेगा। उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था कि असली तृणमूल कार्यकर्ता उनके साथ हैं और पार्टी फिर से वापसी करेगी।
उनके इस बयान को बागी नेताओं पर दबाव बनाने और संगठन में अनुशासन कायम करने की कोशिश के रूप में देखा गया था। अब हमीदुल रहमान और अन्य नेताओं के बयानों के बाद यह देखना अहम होगा कि क्या ममता बनर्जी की अपील का पार्टी के भीतर कोई ठोस असर पड़ता है।
उपचुनाव में भी आमने-सामने दिखे दोनों गुट
तृणमूल कांग्रेस के भीतर मतभेदों का असर हालिया उपचुनावों में भी देखने को मिला था। रेजीनगर और नंदीग्राम सीटों पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और ऋताब्रत गुट ने अलग-अलग उम्मीदवार उतारे थे।
नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के बाद खाली हुई थी, जबकि रेजीनगर सीट से आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद उपचुनाव हुआ था। दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीत दर्ज की थी।
दोनों गुटों के अलग-अलग चुनाव लड़ने से तृणमूल कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए। राजनीतिक रूप से इस घटनाक्रम ने पार्टी की एकजुटता और चुनावी रणनीति को लेकर सवाल खड़े किए।
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर क्या है स्थिति?
पार्टी के विभाजन के बीच भारत निर्वाचन आयोग की ओर से तृणमूल कांग्रेस के नाम और दो फूल वाले चुनाव चिह्न को फ्रीज किए जाने की बात भी सामने आई है। इसका अर्थ है कि संबंधित गुट निर्धारित व्यवस्था के तहत पुराने नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिह्न मिला, जबकि बागी गुट ने ‘ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम अपनाया और उसका चुनाव चिह्न लिफाफा बताया गया है।
इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान और संगठनात्मक भविष्य को लेकर स्थिति को और दिलचस्प बना दिया है। हालांकि, नाम और चुनाव चिह्न से संबंधित मौजूदा स्थिति की पुष्टि निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आदेशों से करना जरूरी है।
क्या फिर एकजुट होगी तृणमूल कांग्रेस?
हमीदुल रहमान का ममता बनर्जी के प्रति समर्थन जताना, कासिम सिद्दीकी का बागी गुट छोड़ना और रतिन घोष का बयान ऐसे घटनाक्रम हैं, जिनसे तृणमूल कांग्रेस के भीतर नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना पर चर्चा हो रही है।
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फिलहाल, किसी बड़े स्तर पर एकजुटता या सामूहिक घर वापसी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले दिनों में बागी नेताओं के फैसले, ममता बनर्जी की रणनीति और दोनों गुटों के बीच राजनीतिक संवाद यह तय करने में अहम होंगे कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस फिर से एकजुट हो पाती है या पार्टी के भीतर विभाजन कायम रहता है।



