अधिकारी-कर्मचारियों पर समान रूप से नियम लागू हों

निलंबन के बाद कारण बताओ नोटिस पर शिक्षिकाओं का जवाब

इटावा। बेसिक शिक्षा विभाग में महिला सहायक अध्यापिकाओं से जुड़े निलंबन,और वेतन वृद्धि को रोकने का निरस्तीकरण और कारण बताओ नोटिस के मामले में अब संबंधित शिक्षिकाओं ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को विस्तृत,तथ्यपरक एवं विधिक स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है। शिक्षिकाओं ने अपने जवाब में कहा है कि उन्होंने किसी मीडिया संस्थान को प्रेसवार्ता के लिए आमंत्रित नहीं किया था और कार्यालय के बाहर पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों पर अपने साथ हुई प्रशासनिक कार्रवाई के संबंध में अपनी बात रखी थी।

सहायक अध्यापिका प्रीति बघेला,कांति एवं मनीषा की ओर से प्रस्तुत संयुक्त व व्यक्तिगत जवाब में कारण बताओ नोटिस पत्रांक 3716-23/2026-27, दिनांक 5 सितंबर 2026 का उल्लेख करते हुए बताया है कि नोटिस में उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली,1956 के नियम 3,6 एवं 7 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है,लेकिन शिक्षिकाओं के अनुसार उन्होंने सरकार की किसी नीति अथवा शासकीय योजना की आलोचना नहीं की।

मीडिया को नहीं बुलाया

शिक्षिकाओं ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि उनके द्वारा कोई पूर्वनियोजित प्रेसवार्ता आयोजित नहीं की गई थी और न ही किसी मीडिया संस्थान को अधिकृत बयान देने के लिए बुलाया गया था। उनके अनुसार,यदि पत्रकारों ने उनसे कार्यालय के बाहर सवाल पूछे तो उन्होंने केवल अपने साथ हुई प्रशासनिक कार्रवाई एवं अपनी स्थिति के संबंध में तथ्य रखे।

शिक्षिकाओं ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी मीडिया प्रतिनिधि को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानतीं और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित मीडिया प्रतिनिधि वहां किस माध्यम से पहुंचे थे।

बीएसए ने भी मीडिया को दिया बयान:नियम समान क्यों नहीं?

शिक्षिकाओं के जवाब में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठाया गया है कि जिन मीडिया चैनलों,डिजिटल न्यूज पोर्टलों अथवा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी बातचीत को नोटिस में आधार बनाया गया है,उन्हीं प्रकरणों के संबंध में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा भी मीडिया को बयान दिए जाने की बात शिक्षिकाओं ने कही है।

शिक्षिकाओं का तर्क है कि यदि मीडिया के माध्यम से किसी प्रकरण पर अपनी बात रखना विभागीय अनुशासन के विरुद्ध माना जाता है,तो संबंधित नियम सभी सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

उनका कहना है कि एक ही प्रकरण में अधिकारी द्वारा मीडिया को अपना पक्ष बताना स्वीकार्य हो और अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर देने को अनुशासनहीनता माना जाए,तो इस अंतर का प्रशासनिक आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए।

निलंबन आदेश,निरस्तीकरण बनाया आधार

शिक्षिकाओं ने अपने जवाब में 31 अगस्त 2026 के निलंबन आदेश पत्रांक 3640-48/2026-27 तथा 3 सितंबर 2026 के निरस्तीकरण आदेश पत्रांक बेसिक/निरी०/3691-97/2026-27 का भी उल्लेख किया है।

उनका कहना है कि 31 अगस्त को जारी निलंबन संबंधी कार्रवाई को 3 सितंबर को स्वयं विभाग द्वारा निरस्त कर दिया गया। ऐसे में 2 सितंबर को उनके द्वारा मीडिया के समक्ष अपनी स्थिति बताने की घटना को किस प्रशासनिक आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का विषय बनाया गया, यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

शिक्षिकाओं ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई से उन्हें मानसिक तनाव और प्रशासनिक परेशानी का सामना करना पड़ा।

न्यायिक दृष्टांतों का हवाला

स्पष्टीकरण में शिक्षिकाओं ने संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ-साथ विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया है। इनमें कामेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य,ओ.के.घोष बनाम ई.एक्स.जोसेफ तथा लिपिका पॉल बनाम त्रिपुरा राज्य जैसे मामलों का उल्लेख किया गया है।

शिक्षिकाओं ने अपने जवाब में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक कथित हालिया निर्णय Writ-A No. 10433 of 2026, प्रदीप प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य का भी हवाला देते हुए कहा है कि अन्याय, अनियमितता अथवा सेवा संबंधी विषय पर तथ्य रखने मात्र को स्वतः कदाचार नहीं माना जा सकता।

हालांकि,इन न्यायिक दृष्टांतों की वास्तविक लागू-योग्यता संबंधित मामले के तथ्यों,सेवा नियमों और न्यायालय के मूल आदेश के संदर्भ में ही निर्धारित होगी।

नियम एक वर्ग,व्यक्ति के लिए अलग नहीं होते

शिक्षिकाओं का कहना है कि वे किसी विशेष रियायत की मांग नहीं कर रही हैं। उनका स्पष्ट पक्ष है कि यदि सरकारी कर्मचारियों के लिए मीडिया से संवाद अथवा विभागीय विषयों पर सार्वजनिक रूप से बात रखने के संबंध में कोई आचरण नियम लागू है, तो उसका पालन अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक समान रूप से होना चाहिए।

उन्होंने अपने जवाब में यह भी कहा है कि प्रशासनिक कार्रवाई स्पष्ट,तथ्यपरक और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए तथा किसी कर्मचारी को अनावश्यक मानसिक या प्रशासनिक दबाव में नहीं रखा जाना चाहिए।

कारण बताओ नोटिस वापस की मांग

शिक्षिकाओं ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से अपने विस्तृत स्पष्टीकरण को अभिलेख पर लेते हुए कारण बताओ नोटिस दिनांक 5 सितंबर 2026 को निरस्त व नस्तीबद्ध किए जाने का अनुरोध किया है। साथ ही उन्होंने बिना अनावश्यक मानसिक एवं प्रशासनिक दबाव के अपने पदीय दायित्वों का निर्वहन करने का अवसर दिए जाने की मांग की है।

इस मामले में अब विभागीय स्तर से शिक्षिकाओं के जवाब पर क्या निर्णय लिया जाता है,यह महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल प्रकरण में 31 अगस्त का निलंबन आदेश जारी,3 सितंबर को पत्र रिसीव करवाया गया और 3 सितंबर का निरस्तीकरण आदेश बेसिक शिक्षा अधिकारी इटावा के द्वारा निकाला गया। 5 सितंबर का कारण बताओ नोटिस- तीनों दस्तावेज घटनाक्रम की अलग-अलग कड़ियों को सामने रखते हैं। शिक्षिकाओं का पक्ष है कि पूरे मामले में समान नियम,समान प्रक्रिया और समान प्रशासनिक मानदंड लागू किए जाने चाहिए। इससे साफ जाहिर होता है कि बेसिक शिक्षा अधिकारी इटावा के द्वारा जानबूझकर महिला शिक्षिकाओं को मानसिक प्रताड़ित किया जा रहा है। इस विषय पर शासन को संज्ञान लेना चाहिए।

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