चकबंदी में मनमानी: रैकवारडीह के ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, ‘पर्चा 23’ निरस्त करने की मांग
1976 के पट्टेदारों को 50 साल बाद भी नहीं मिला कब्जा

सुजीत कुमार मऊ।
मऊ। विकास खंड परदहाँ के चकबंदी ग्राम रैकवारडीह में चल रही चकबंदी प्रक्रिया को लेकर ग्रामीणों और काश्तकारों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का आरोप है कि चकबंदी अधिकारियों की लापरवाही के कारण बिना किसानों की सहमति के ‘पर्चा 23’ जारी कर दिया गया है। इसमें किसानों के चकों को इधर-उधर कर दिया गया है।
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी और उच्च अधिकारियों को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि सहायक चकबंदी अधिकारी स्तर पर ही पर्चा 23 में हुई गड़बड़ियों को तुरंत निरस्त किया जाए और काश्तकारों की आपसी सहमति से चकों का पुनर्गठन हो।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1976 में गांव के दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को कृषि और आवास के लिए भूमि आवंटित की गई थी। लेकिन इतने दशक बीत जाने के बाद भी इन गरीब परिवारों को उनकी जमीन पर कब्जा नहीं मिला है और न ही राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया है। ग्रामीणों ने मांग की है कि पुरानी पट्टा सूची के अनुसार दलितों-पिछड़ों को उनकी जमीन का मालिकाना हक और कब्जा दिलाया जाए।
सार्वजनिक सुविधाओं के लिए जमीन सुरक्षित करने की मांग
गांव के विकास और मूलभूत सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए ग्रामीणों ने चकबंदी प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक उपयोग की जमीनों को सुरक्षित करने के लिए 15 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा है।
मुख्य मांगों में शामिल हैं
सड़क व चकमार्ग: रैकवारडीह, बडुआ-काझाँ मुख्य मार्ग पर पानी की टंकी से सरेजा चौहान बस्ती होते हुए कौड़ीपुरा तक लगभग 25 कड़ी चौड़ा रास्ता दिया जाए। इसके अलावा प्राइमरी स्कूल, रेलवे अंडरपास, बनवा पोखरा और सरेजा मोड़ के पास विभिन्न काश्तकारों के खेतों से होते हुए नए चकमार्गों का प्रावधान किया जाए।
जल निकासी: सरेजा चौहान बस्ती, दलित बस्ती और रेलवे फाटक के पास से भैंसहीं नदी तक नाले और नालियों का निर्माण कर जल निकासी की पक्की व्यवस्था की जाए।
सामुदायिक भवन व शौचालय पूर्वी दलित बस्ती में पानी की टंकी के पास (गाटा सं० 1108 क, ख) खाली ग्राम सभा भूमि पर कम्युनिटी हॉल, बारात घर और सामुदायिक शौचालय के लिए स्थान सुरक्षित किया जाए।गांव में कूड़ा निस्तारण स्थान, खेलकूद का मैदान और आंबेडकर पार्क के लिए चकबंदी के दौरान ही भूमि आरक्षित की जाए।
ग्रामीणों ने मांग पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी है कि दलित आबादी से सटे क्षेत्रों में किसी बाहरी काश्तकार का चक न बनाया जाए और न ही वहां से स्थानीय लोगों का चक हटाया जाए। ऐसा करने से भविष्य में आबादी विस्तार और संपर्क मार्गों के निर्माण में बाधा आएगी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते पर्चा 23 की गड़बड़ियों को सुधारा नहीं गया और सार्वजनिक हित में जमीनें आरक्षित नहीं की गईं, तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।



